DDGS Import से मक्का, सोयाबीन और खल के भाव पर खतरा, किसानों की चिंता बढ़ी, जानें घरेलू बाजार की पूरी स्थिति

DDGS Import

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DDGS Import: भारत और अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते ने देश के कृषि बाजार में नई बहस छेड़ दी है। इस समझौते के तहत DDGS यानी डिस्टिलर्स ड्राई ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स के आयात को अनुमति मिलने से तिलहन और अनाज बाजार में भूचाल आने की आशंका जताई जा रही है। व्यापारिक विशेषज्ञों और कृषि विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले का सबसे अधिक असर मक्का, सोयाबीन, सोयामील और सरसों खल की कीमतों पर पड़ सकता है। किसान संगठन इस समझौते को घरेलू कृषि के हितों के खिलाफ बता रहे हैं और देशभर में विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं। आइए समझते हैं कि DDGS क्या है, इसका आयात क्यों चिंताजनक है और भारतीय किसानों पर इसका क्या असर होगा।

DDGS Import: क्या है DDGS और इसका उपयोग?

DDGS असल में अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन प्रक्रिया का उप-उत्पाद है। जब मक्का या चावल से इथेनॉल बनाया जाता है तो इस प्रक्रिया में एक बाय-प्रोडक्ट निकलता है जिसे DDGS कहते हैं। यह उत्पाद प्रोटीन से भरपूर होता है और इसका मुख्य उपयोग पशु और पोल्ट्री चारे में किया जाता है।

पोल्ट्री उद्योग में DDGS को सोयामील का एक विकल्प माना जाता है। सोयामील भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत है जो मुर्गी और मवेशियों के चारे में मिलाया जाता है। अगर DDGS सस्ती दरों पर उपलब्ध हो जाए तो पोल्ट्री फार्म सोयामील की जगह DDGS का उपयोग (DDGS Import) करना शुरू कर सकते हैं।

यही कारण है कि सोयाबीन किसानों और तिलहन उद्योग में इसके आयात को लेकर गहरी चिंता है। अगर सोयामील की मांग घट जाए तो सोयाबीन के दाम गिरेंगे और किसानों को भारी नुकसान होगा।

अभी तक का आयात शुल्क और नया परिदृश्य

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार अब तक पशु चारे के लिए DDGS आयात (DDGS Import) पर 15 प्रतिशत का शुल्क लगता था। यह शुल्क घरेलू उद्योग को सुरक्षा प्रदान करता था। लेकिन भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में इस शुल्क में कमी या छूट दिए जाने की बात कही जा रही है।

अगर DDGS का आयात शुल्क कम होता है या खत्म होता है तो अमेरिकी DDGS भारतीय बाजार में सस्ती दरों पर उपलब्ध होगा। इससे घरेलू सोयामील, मक्का और सरसों खल की मांग प्रभावित होगी। परिणामस्वरूप इन फसलों के दाम गिरेंगे।

उद्योग विशेषज्ञों की राय

कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन यानी CLFMA के चेयरमैन दिव्य कुमार गुलाटी ने इस मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण रखा। उनका कहना है कि मक्का की कीमतों पर इसका बहुत अधिक असर नहीं पड़ेगा लेकिन सोयाबीन पर कुछ दबाव जरूर बन सकता है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सोयामील को पूरी तरह से DDGS से बदला नहीं जा सकता। ब्रॉयलर और लेयर पोल्ट्री के लिए सोयामील का पोषण संतुलन सबसे उपयुक्त माना जाता है। DDGS में प्रोटीन तो होता है लेकिन उसकी पोषण संरचना सोयामील से अलग है।

इसलिए पोल्ट्री उद्योग (DDGS Import) पूरी तरह से DDGS पर निर्भर नहीं हो सकता। वे सोयामील का एक हिस्सा DDGS से बदल सकते हैं लेकिन पूरी तरह नहीं। फिर भी आंशिक प्रतिस्थापन से भी सोयाबीन की मांग में गिरावट आएगी।

DDGS Import: घरेलू DDGS उत्पादन की स्थिति

बाजार विश्लेषकों के अनुसार भारत में पहले से ही मक्का आधारित DDGS की पर्याप्त आपूर्ति है। देश में कई इथेनॉल उत्पादन इकाइयां हैं जो मक्का से इथेनॉल बनाती हैं और उप-उत्पाद के रूप में DDGS तैयार करती हैं।

इसके अलावा अब चावल आधारित DDGS का उत्पादन (DDGS Import) भी शुरू हो गया है। सरकार ने टूटे चावल और अधिशेष चावल से इथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहित किया है। इस प्रक्रिया में भी DDGS निकलता है जो बाजार में आ रहा है।

ऐसे में अगर ऊपर से अमेरिकी DDGS भी बड़े पैमाने पर आयात होता है तो घरेलू बाजार में आपूर्ति बहुत बढ़ जाएगी। इससे न केवल DDGS के दाम गिरेंगे बल्कि मक्का, सोयाबीन और सरसों की कीमतों पर भी दबाव बनेगा।

कितना DDGS आयात उचित है?

उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि आयात को सीमित रखा जाना चाहिए। उनकी सलाह है कि सालाना केवल 1 से 2 लाख टन तक DDGS का आयात (DDGS Import) किया जाए। यह मात्रा इतनी होगी कि घरेलू बाजार पर बहुत अधिक नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

लेकिन अगर इससे अधिक मात्रा में आयात होता है तो घरेलू किसानों और उद्योग को गंभीर नुकसान हो सकता है। विशेषकर छोटे और मध्यम किसान जो सोयाबीन और मक्का की खेती पर निर्भर हैं, उन्हें भारी झटका लग सकता है।

DDGS Import: सोयाबीन और सरसों के भाव में गिरावट

व्यापार सूत्रों के अनुसार भारत-अमेरिका समझौते (India-US Trade Deal) की खबर के तुरंत बाद ही सोयाबीन और सरसों के भाव में नरमी देखी गई है। यह बाजार की प्रतिक्रिया (DDGS Import) है जो भविष्य की आशंकाओं को दर्शाती है।

कुछ प्रमुख मंडियों में सोयाबीन के दाम कुछ ही दिनों में 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गए हैं। यह किसानों के लिए चिंता की बात है क्योंकि उनकी आय सीधे इन दामों पर निर्भर करती है।

इसी तरह सरसों और मक्का के भाव में भी गिरावट दर्ज की गई है। व्यापारी भविष्य में और गिरावट की उम्मीद में खरीदारी रोक रहे हैं। इससे किसानों को अपनी उपज बेचने में कठिनाई हो रही है।

DDGS की अंतरराष्ट्रीय कीमत और लैंडिंग कॉस्ट

हालांकि तत्काल बहुत बड़े दबाव की आशंका नहीं है। अप्रैल-मई के लिए अमेरिका से DDGS की अंतरराष्ट्रीय कीमत करीब 250 डॉलर प्रति टन बताई जा रही है।

जब इसमें परिवहन खर्च, कंटेनर शुल्क और अन्य लागतें जोड़ी जाती हैं तो भारत में इसकी लैंडिंग कीमत लगभग 27,500 रुपये प्रति टन पड़ती है। इस स्तर पर आयातित DDGS भारतीय सोयामील या घरेलू DDGS से बहुत सस्ता नहीं है।

लेकिन अगर भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरती हैं या आयात शुल्क में और कटौती होती है तो DDGS बहुत सस्ता हो सकता है। तब घरेलू बाजार पर गंभीर असर पड़ेगा।

DDGS Import: डेयरी सेक्टर पर प्रभाव सीमित

दुग्ध क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि डेयरी फीड में DDGS का उपयोग बहुत सीमित है। दुधारू पशुओं के लिए चारे की संरचना अलग होती है और उसमें DDGS की बड़ी भूमिका नहीं है।

इसलिए दूध उत्पादन क्षेत्र पर DDGS आयात (DDGS Import) का बहुत अधिक प्रभाव नहीं होगा। यह कुछ राहत देने वाली बात है क्योंकि भारत में डेयरी एक बहुत बड़ा उद्योग है जिसमें लाखों किसान जुड़े हैं।

किसानों का विरोध और आंदोलन की तैयारी

किसान संगठनों ने इस व्यापार समझौते (DDGS Import) का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि सरकार ने किसानों के हितों की अनदेखी करते हुए यह समझौता किया है। कई किसान संगठन 12 फरवरी को देशभर में विरोध प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं।

किसान नेताओं का आरोप है कि DDGS आयात से सोयाबीन और मक्का उत्पादक किसानों को भारी नुकसान होगा। वे मांग कर रहे हैं कि सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार करे और घरेलू कृषि के हितों की रक्षा करे।

DDGS Import: आगे की राह

यह मुद्दा केवल व्यापार का नहीं बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका का है। सरकार को DDGS आयात पर सख्त निगरानी रखनी होगी। मात्रा सीमित रखी जाए और घरेलू बाजार पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े, इसकी व्यवस्था करनी होगी। किसानों की चिंताओं को गंभीरता से लेना जरूरी है।

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