UP Farmer News: होली के बाद उत्तर प्रदेश के मौसम में बदलाव, तापमान बढ़ने से फसलों पर संकट, कृषि विशेषज्ञों ने गेहूं-सरसों-चने के लिए जारी की विशेष सलाह, हल्की सिंचाई जरूरी, जानें पूरी गाइडलाइन

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UP Farmer News: होली का रंगीन त्योहार बीतते ही उत्तर प्रदेश के कई शहरों और कृषि क्षेत्रों में अच्छी खासी गर्मी पड़ने लगी है। मार्च का महीना शुरू होते ही मौसम में तेजी से बदलाव आ रहा है। तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है और किसानों की रबी फसलें महत्वपूर्ण अवस्था में हैं। इसी को देखते हुए उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद यानी उपकार के महानिदेशक डॉ. संजय सिंह की अध्यक्षता में क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में प्रदेश के किसानों को आगामी दो सप्ताह के लिए महत्वपूर्ण सुझाव और परामर्श जारी किए गए हैं। मौसम पूर्वानुमान के अनुसार आने वाले दिनों में प्रदेश के समस्त कृषि जलवायु अंचलों में तापमान में वृद्धि होने की संभावना है। यह बढ़ता तापमान रबी फसलों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। गेहूं, सरसों, चना, अरहर जैसी फसलें अपने महत्वपूर्ण चरण में हैं। गेहूं में दाना भरने की अवस्था है। सरसों में फलियां बन रही हैं। चने में फलियां आ चुकी हैं। इस समय तापमान में अचानक वृद्धि और तेज हवाओं से फसलों को नुकसान हो सकता है। उपकार के महानिदेशक डॉ. संजय सिंह ने बताया कि बढ़ते तापमान और तेज हवाओं के कारण किसानों को रबी फसलों के खेतों में नमी बनाए रखने के लिए आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करने की सलाह दी है। यह सलाह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि मिट्टी में नमी की कमी से फसल की उपज पर सीधा असर पड़ता है।

UP Farmer News: गेहूं की फसल के लिए विशेष सलाह

गेहूं उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण रबी फसल है। प्रदेश में लाखों हेक्टेयर में गेहूं की खेती होती है। इस समय गेहूं की फसल अपनी सबसे नाजुक अवस्था में है। देर से बोए गए गेहूं में दाना भरने की अवस्था चल रही है। इस अवस्था में पोषक तत्वों की कमी फसल को बहुत नुकसान पहुंचा सकती है। डॉ. संजय सिंह ने बताया कि देर से बोए गए गेहूं में दाना भरने की अवस्था में पोटैशियम नाइट्रेट का छिड़काव करना चाहिए। पोटैशियम नाइट्रेट एक उत्कृष्ट पोषक तत्व है जो दाने की गुणवत्ता और वजन बढ़ाता है। यह फसल को तनाव से बचाता है। गर्मी और सूखे के प्रभाव को कम करता है। पोटैशियम नाइट्रेट का छिड़काव प्रति एकड़ 5 से 10 किलोग्राम की दर से किया जा सकता है। इसे 200 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करना चाहिए। इसके अलावा गेहूं में दो प्रमुख रोगों का खतरा है। पहला है गेरूई रोग जिसे रस्ट भी कहते हैं। दूसरा है पत्ती धब्बा रोग जिसे लीफ ब्लाइट कहते हैं। गेरूई रोग में पत्तियों पर जंग जैसे भूरे या पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। पत्ती धब्बा रोग में पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। दोनों रोग फसल की उपज को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। इन रोगों के नियंत्रण हेतु प्रोपीकोनाजोल के प्रयोग का सुझाव दिया गया है। प्रोपीकोनाजोल एक प्रभावी फफूंदनाशक है। इसका छिड़काव 250 से 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से करना चाहिए। समय पर छिड़काव से रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।

UP Farmer News: चने और अरहर में कीट प्रबंधन

चना और अरहर भी महत्वपूर्ण रबी दलहनी फसलें हैं। इस समय इन फसलों में फलियां आ चुकी हैं या आने वाली हैं। इस अवस्था में कीटों का प्रकोप बहुत खतरनाक होता है। चने में फलीबेधक कीट का प्रकोप होता है। यह कीट फलियों में छेद करके अंदर के दानों को खा जाता है। इससे उपज में भारी नुकसान होता है। अरहर में फल मक्खी का प्रकोप होता है। यह मक्खी फलियों में अंडे देती है। अंडे से निकले लार्वा फली के अंदर के दानों को नष्ट कर देते हैं। विशेषज्ञों ने इन कीटों के प्रकोप को रोकने के लिए उचित कीटनाशकों के छिड़काव की सलाह दी है। चने में फलीबेधक के नियंत्रण के लिए क्विनालफॉस या क्लोरपायरीफॉस का छिड़काव किया जा सकता है। अरहर में फल मक्खी के नियंत्रण के लिए मैलाथियन या डाइमेथोएट का उपयोग कर सकते हैं। कीटनाशकों का छिड़काव शाम के समय करना चाहिए। सुबह के समय छिड़काव से परागण करने वाले कीट जैसे मधुमक्खियों को नुकसान हो सकता है।

UP Farmer News: सरसों की फसल में चेपा कीट का प्रबंधन

सरसों उत्तर प्रदेश की एक प्रमुख तिलहनी फसल है। इस समय सरसों में फलियां बन रही हैं। सरसों की फसल में चेपा कीट यानी एफिड का प्रकोप एक बड़ी समस्या है। चेपा कीट बहुत छोटे हरे रंग के कीट होते हैं जो पौधे का रस चूसते हैं। ये कीट बहुत तेजी से संख्या में बढ़ते हैं। अगर समय पर नियंत्रण न किया जाए तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों ने सावधानी बरतने की सलाह दी है। अनावश्यक छिड़काव नहीं करना चाहिए। सरसों की फसल के लिए बताया गया है कि अगर 40 से 50 प्रतिशत पौधों पर कीट का असर दिखे या मुख्य तने के ऊपरी हिस्से पर 50 से 60 चेपा नजर आएं तभी छिड़काव करें। यह आर्थिक हानि स्तर कहलाता है। इससे कम प्रकोप में छिड़काव से लागत बढ़ती है और लाभकारी कीटों को भी नुकसान होता है। ऐसी स्थिति में किसान एक एकड़ में 40 ग्राम थियामेथोक्साम या 400 मिलीलीटर डाइमेथोएट का इस्तेमाल कर सकते हैं। थियामेथोक्साम एक आधुनिक कीटनाशक है जो चूसने वाले कीटों पर बहुत प्रभावी है। डाइमेथोएट एक पारंपरिक लेकिन प्रभावी कीटनाशक है। समय पर निगरानी और सही प्रबंधन ही फसल को नुकसान से बचाने का मुख्य उपाय है। किसानों को सलाह है कि हर 3 से 4 दिन में खेत का निरीक्षण करें।

UP Farmer News: जायद की फसलों की बुवाई का उपयुक्त समय

रबी फसलों की कटाई के बाद जायद सीजन शुरू होता है। जायद की फसलें गर्मी के मौसम में उगाई जाती हैं। बैठक में जानकारी दी गई कि वर्तमान मौसम जायद की फसलों जैसे टमाटर, भिंडी, लोबिया और कद्दूवर्गीय सब्जियों की बुवाई के लिए पूरी तरह अनुकूल है। टमाटर एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल है जिसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। जायद में टमाटर की खेती से अच्छा लाभ मिल सकता है। भिंडी भी एक लोकप्रिय सब्जी है। गर्मी में भिंडी की मांग बढ़ जाती है। लोबिया एक दलहनी सब्जी है जो पोषक तत्वों से भरपूर है। कद्दूवर्गीय सब्जियों में लौकी, तोरी, करेला, कद्दू, खीरा, तरबूज, खरबूजा आदि शामिल हैं। इन सभी की जायद में अच्छी खेती हो सकती है। किसानों को सलाह है कि उन्नत किस्मों के बीज का उपयोग करें। समय पर बुवाई करें। उचित दूरी पर पौधे लगाएं।

UP Farmer News: बसंतकालीन गन्ने की बुवाई के लिए महत्वपूर्ण निर्देश

गन्ना उत्तर प्रदेश की एक प्रमुख नकदी फसल है। गन्ने की बुवाई दो समय में की जाती है। पहली शरद कालीन जो अक्टूबर नवंबर में होती है। दूसरी बसंत कालीन जो फरवरी मार्च में होती है। इस समय बसंत कालीन गन्ने की बुवाई का सही समय चल रहा है। बसंतकालीन गन्ने की बुवाई हेतु नवीन उन्नत किस्मों के प्रयोग पर बल दिया गया है। उन्नत किस्में अधिक उपज देती हैं। रोग प्रतिरोधी होती हैं। चीनी की मात्रा अधिक होती है। सीओ 0238, सीओ 0403, सीओ 15023 जैसी किस्में लोकप्रिय हैं। हालांकि एक बहुत महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की गई है। लाल सड़न रोग से संक्रमित किस्म को 0238 की बुवाई न करने की सख्त हिदायत दी गई है। लाल सड़न गन्ने का एक गंभीर रोग है। यह रोग मिट्टी और बीज दोनों से फैलता है। संक्रमित किस्म की बुवाई से पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।

UP Farmer News: गन्ने के साथ अंतरफसली खेती से बढ़ेगी आय

डॉ. संजय सिंह ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि गन्ने के साथ अंतःफसल के रूप में उर्द, मूंग या लोबिया की खेती कर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। अंतरफसली खेती एक वैज्ञानिक विधि है। इसमें मुख्य फसल के साथ दूसरी फसल भी उगाई जाती है। गन्ना एक लंबी अवधि की फसल है। बुवाई के बाद शुरुआती 3 से 4 महीने गन्ना धीरे बढ़ता है। इस समय पंक्तियों के बीच काफी जगह खाली रहती है। इस जगह का उपयोग करके उर्द, मूंग या लोबिया उगाया जा सकता है। ये फसलें 60 से 75 दिन में तैयार हो जाती हैं। ये दलहनी फसलें हैं जो मिट्टी में नाइट्रोजन भी स्थिर करती हैं। इससे गन्ने को भी लाभ मिलता है।

UP Farmer News: आम और अन्य बागवानी फसलों की देखभाल

उद्यान एवं अन्य प्रभागों के लिए जारी परामर्श में आम के बौर को कीटों और खर्रा रोग से बचाने के उपाय साझा किए गए हैं। आम की फसल इस समय बौर आने की अवस्था में है। पशुपालकों को एफएमडी यानी फुट एंड माउथ डिजीज के निशुल्क टीकाकरण का लाभ उठाने की सलाह दी गई।

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