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गोबर से लाखों का साम्राज्य, 40 केंचुओं से शुरू किया सफर, आज 15,000 क्विंटल सालाना उत्पादन, यूपी के नागेंद्र पांडेय बने वर्मी कंपोस्ट के ‘किंग’

Success Story of Nagendra Pandey

Success Story of Nagendra Pandey

Success Story of Nagendra Pandey: आज जब देश का हर युवा किसान परिवार से निकलकर शहर की तरफ भागना चाहता है तब उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के एक छोटे से गांव नंदना के नागेंद्र पांडेय ने इस सोच को पूरी तरह पलट कर रख दिया। उन्होंने न केवल खुद गांव में रहकर लाखों का कारोबार खड़ा किया बल्कि दर्जनों परिवारों को रोजगार भी दिया। उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर सोच सही हो और मेहनत का जज्बा हो तो गोबर भी सोना बन सकता है।

Success Story of Nagendra Pandey: 15 साल की नौकरी की तलाश

नागेंद्र पांडेय ने कृषि में स्नातक की डिग्री हासिल की थी। पढ़ाई के बाद उन्होंने भी आम युवाओं की तरह 15 साल तक नौकरी की तलाश की। लेकिन सफलता नहीं मिली। जहां दूसरे लोग इस स्थिति में हताश होकर बैठ जाते वहां नागेंद्र ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन की तरफ रुख किया और कुछ नया करने का जोखिम उठाया।

उन्होंने अपने आसपास देखा कि किसान महंगी रासायनिक खादों के बोझ तले दबते जा रहे थे। खेतों की मिट्टी की उर्वरता लगातार घट रही थी। इसी समस्या का समाधान तलाशते हुए उनके मन में वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद बनाने का विचार आया। समाज में गोबर के काम को दोयम दर्जे का माना जाता था लेकिन नागेंद्र ने इस सोच को सीधे चुनौती दी।

Success Story of Nagendra Pandey: 40 केंचुओं से शुरू हुई क्रांति

नागेंद्र का सफर बेहद मामूली शुरुआत से हुआ। जब उन्होंने वर्मी कंपोस्ट बनाने का फैसला किया तो सरकारी विभागों से केंचुए मिलना आसान नहीं था। ऐसे में एक दोस्त ने उनकी मदद की और उन्हें महज 40 से 50 केंचुए दिए। नागेंद्र ने इन केंचुओं को एक पुरानी नाद में गोबर और सूखी पत्तियों के बीच डाल दिया और इंतजार करने लगे।

कड़ी मेहनत और धैर्य का परिणाम चौंकाने वाला था। मात्र 45 दिनों में वे 40-50 केंचुए बढ़कर 2 किलो हो गए। यह नागेंद्र के लिए एक बड़ा संकेत था। साल 2000 में शुरू हुआ यह छोटा सा प्रयोग आज एक विशाल कारोबार का रूप ले चुका है।

Success Story of Nagendra Pandey: 40,000 वर्ग फुट, 15,000 क्विंटल सालाना

आज नागेंद्र पांडेय के पास 40,000 वर्ग फुट का विशाल एरिया है। इसमें से 18,000 वर्ग फुट में उनकी सक्रिय वर्मी कंपोस्ट यूनिट चल रही है जिसकी सालाना उत्पादन क्षमता 15,000 क्विंटल है। उनके पास तीन बड़ी इकाइयां हैं। उनकी यूनिट में सालाना करीब 30,000 क्विंटल पशु अपशिष्ट का जैविक निपटान किया जाता है जिससे पर्यावरण भी साफ रहता है और शुद्ध जैविक खाद भी तैयार होती है।

Success Story of Nagendra Pandey: किसानों को ऐसे जीता भरोसा

शुरुआत में नागेंद्र को लोगों के विरोध और अविश्वास का सामना करना पड़ा। किसान रासायनिक खादों के आदी थे और उन्हें लगता था कि गोबर की खाद से पर्याप्त पैदावार नहीं होगी। लेकिन नागेंद्र ने हार नहीं मानी। वे गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक करने लगे। उन्होंने एक अनूठी रणनीति अपनाई। वे किसानों से कहते थे कि एक बार इस खाद को आजमाएं और फायदा न हो तो दोबारा मत लेना। उनकी यह ईमानदारी धीरे-धीरे रंग लाई और आज उनके वर्मी कंपोस्ट की भारी मांग है।

Success Story of Nagendra Pandey: वर्मी कंपोस्ट, खेत के लिए अमृत

नागेंद्र बताते हैं कि उनकी खाद की गुणवत्ता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। लैब टेस्ट में पाया गया है कि उनके वर्मी कंपोस्ट में 1.8 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2.5 प्रतिशत फास्फोरस और 3.23 प्रतिशत पोटाश होता है। यह खाद मिट्टी की जल सोखने की क्षमता बढ़ाती है और खरपतवारों को भी नियंत्रित करती है।

नागेंद्र केवल ठोस खाद ही नहीं बल्कि वर्मी वाश भी तैयार करते हैं। वर्मी वाश केंचुओं के शरीर का तरल अर्क होता है जो फसलों के लिए प्राकृतिक कीटनाशक और वृद्धि प्रवर्तक दोनों का काम करता है। उनकी खाद की 25 किलो की बोरी मात्र 200 रुपये में उपलब्ध है जो रासायनिक खादों की तुलना में बेहद सस्ती और टिकाऊ है। वे किसानों को मुफ्त में केंचुए भी उपलब्ध कराते हैं ताकि वे खुद भी आत्मनिर्भर बन सकें।

Success Story of Nagendra Pandey: 32 परिवारों को दिया रोजगार

नागेंद्र पांडेय की सफलता की कहानी सिर्फ उनकी अपनी कमाई तक सीमित नहीं है। उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों को भी आर्थिक मजबूती दी है। आज उनकी यूनिट में 32 लोग काम करते हैं जिनमें 23 महिलाएं और 9 पुरुष शामिल हैं। पैकिंग से लेकर खाद की छंटाई और ढुलाई तक के काम से इन परिवारों का घर चल रहा है।

नागेंद्र की यह पहल उन बेरोजगार युवाओं के लिए भी एक संदेश है जो शहरों में रोजगार तलाश रहे हैं। उन्होंने साबित किया है कि खेती को वैज्ञानिक तरीके और नई सोच के साथ अपनाया जाए तो जमीन से जुड़कर भी लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं। गोबर को सड़कों पर फेंकने से प्रदूषण बढ़ता है लेकिन अगर इसे सही तरीके से बिजनेस में बदला जाए तो यह प्रदूषण मुक्त गांव और समृद्ध किसान दोनों का सपना पूरा कर सकता है। नागेंद्र पांडेय की कहानी यही सिखाती है कि गोबर फेंकें नहीं बल्कि इसे अपनी तिजोरी की चाबी बनाएं।

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