Procurement Issue: एक तरफ सरकार ने गेहूं की सरकारी खरीद 15 मार्च से शुरू करने का ऐलान कर दिया है लेकिन दूसरी तरफ सरसों की नई फसल फरवरी से ही मंडियों में आ रही है और अब तक उसकी सरकारी खरीद की तारीख तक तय नहीं हुई। इस भेदभाव को लेकर किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने सरकार पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब खरीद की कोई व्यवस्था नहीं है तो MSP घोषित करना सिर्फ एक दिखावा है। इस स्थिति में किसानों को अपनी सरसों की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है जो उनके साथ सरासर अन्याय है।
Procurement Issue: गेहूं का सत्कार, सरसों को दुत्कार
रामपाल जाट ने इस पूरी स्थिति को बहुत सटीक शब्दों में बयान किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने गेहूं की खरीद 15 मार्च से शुरू करने की घोषणा तो कर दी लेकिन विडंबना यह है कि ज्यादातर इलाकों में अभी गेहूं की कटाई तक शुरू नहीं हुई है। दूसरी तरफ सरसों की नई फसल फरवरी से ही मंडियों में आ रही है और उसके बावजूद सरकारी खरीद का कोई अता-पता नहीं है। यह स्थिति किसानों के साथ घोर अन्याय है। जो फसल पहले आई उसकी खरीद बाद में और जो बाद में आएगी उसकी खरीद पहले। यह उल्टी व्यवस्था किसानों को नुकसान पहुंचा रही है।
Procurement Issue: MSP से नीचे बेचने की मजबूरी
किसान महापंचायत के अनुसार इस समय सरसों की नई फसल मंडियों में पहुंच रही है लेकिन सरकारी खरीद न होने के कारण बाजार में आपूर्ति अधिक है और खरीदार कम हैं। इससे कीमतें दबाव में हैं और किसानों को सरसों का घोषित MSP से भी कम भाव मिल रहा है। रामपाल जाट ने बताया कि जब सरकारी खरीद नहीं होती तो निजी व्यापारी और आढ़तिए किसानों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं और कम दाम पर माल खरीदते हैं। किसान के पास इतनी पूंजी नहीं होती कि वह फसल रोककर रखे इसलिए उसे नुकसान में भी बेचना पड़ता है।
Procurement Issue: पांच साल से एक ही मांग – 1 फरवरी से शुरू हो खरीद
रामपाल जाट ने बताया कि किसान महापंचायत पिछले पांच वर्षों से लगातार यह मांग कर रही है कि सरसों की सरकारी खरीद 1 फरवरी से शुरू की जाए। इसकी वजह यह है कि सरसों की नई फसल फरवरी में ही मंडियों में आना शुरू हो जाती है। अगर उसी समय खरीद शुरू हो जाए तो किसानों को उचित दाम मिले और उन्हें नुकसान न उठाना पड़े। लेकिन हर साल इस मांग को अनसुना किया जाता है और खरीद में देरी होती है। इस बार भी यही हो रहा है।
Procurement Issue: MSP की सार्थकता पर उठाए सवाल
रामपाल जाट ने MSP व्यवस्था की खामियों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करना तब तक अर्थहीन है जब तक उस पर खरीद की ठोस और सुनिश्चित व्यवस्था न हो। उन्होंने इसे “थोथा चना बाजे घणा” की स्थिति बताया। यानी ऊपर से बड़े-बड़े दावे लेकिन जमीन पर किसान को कुछ नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि सरकार 1968 से MSP को गारंटीड मूल्य के रूप में घोषित करती आई है और संसद में भी कई बार आश्वासन दिया गया है कि किसानों को MSP से कम दाम पर उपज नहीं बेचनी पड़ेगी। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
Procurement Issue: CACP की सिफारिशें भी ठंडे बस्ते में
रामपाल जाट ने बताया कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी CACP कई बार खरीद की गारंटी और किसान हितैषी आयात-निर्यात नीति बनाने की सिफारिश कर चुका है। लेकिन इन सिफारिशों को कभी लागू नहीं किया गया। इसके अलावा प्रधानमंत्री द्वारा गठित एक समिति के उपसमूह ने 21 अप्रैल 2023 को MSP पर खरीद की गारंटी देने की अनुशंसा भी की थी। लेकिन उस अनुशंसा पर भी आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
Procurement Issue: विदेशी बाजारों के लिए फुर्ती, किसानों के लिए सुस्ती
किसान नेता ने सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब व्यापारिक समझौतों के तहत विदेशी बाजारों के दरवाजे खोलने की बात आती है तो सरकार बहुत तेजी से काम करती है। लेकिन जब किसानों को उनकी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य दिलाने की बात आती है तो उसमें वह गंभीरता नहीं दिखती। यह किसान विरोधी रवैया है और इसे बदलना होगा।
Procurement Issue: किसान महापंचायत की मांगें
किसान महापंचायत ने सरकार से दो स्पष्ट मांगें रखी हैं। पहली मांग यह है कि सरसों की सरकारी खरीद तत्काल शुरू की जाए ताकि किसानों को उनकी फसल का उचित दाम मिल सके। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण मांग यह है कि MSP पर खरीद की कानूनी गारंटी दी जाए। जब तक यह कानून नहीं बनता तब तक MSP सिर्फ एक घोषणा बनी रहेगी और किसान हर साल इसी तरह ठगे जाते रहेंगे। रामपाल जाट ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने जल्द कदम नहीं उठाए तो किसान आंदोलन और तेज होगा।
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