Pakistan-Afghanistan War: पाकिस्तान इस समय एक साथ कई मोर्चों पर घिरा हुआ है। एक तरफ अफगानिस्तान के साथ खुला युद्ध चल रहा है और दूसरी तरफ अमेरिकी कृषि विभाग यानी USDA की एक रिपोर्ट ने पाकिस्तानी हुक्मरानों की रातों की नींद उड़ा दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में इस बार गेहूं का उत्पादन पिछले साल की तुलना में 20 से 22 लाख टन कम रहने का अनुमान है। यह गिरावट किसी साधारण देश (Pakistan-Afghanistan War) के लिए भी गंभीर होती लेकिन पाकिस्तान के लिए यह एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले सकती है क्योंकि वहां की अधिकांश आबादी का मुख्य भोजन ही गेहूं के आटे पर निर्भर है। रोटी, नान, डबल रोटी और खमीरी रोटी पाकिस्तान के हर घर की थाली का अनिवार्य हिस्सा है। ऊपर से बलोच लड़ाकों का विद्रोह, सिंधु जल समझौते का निलंबन और भयंकर सूखे ने मिलकर एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया है जिससे पाकिस्तान की आम जनता रोटी के लिए तरस सकती है।
Pakistan-Afghanistan War: गेहूं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़
पाकिस्तान (Pakistan-Afghanistan War) और गेहूं का रिश्ता उतना ही गहरा है जितना मांस और मज्जा का। पाकिस्तान (Pakistan-Afghanistan War) के कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में गेहूं की हिस्सेदारी 2 से 3 प्रतिशत तक है। देश का कृषि क्षेत्र गेहूं के बिना अधूरा है। लाखों किसानों की रोजी-रोटी इसी फसल पर टिकी है। यही वजह है कि गेहूं उत्पादन में किसी भी तरह की गिरावट सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल देती है। जानकारों का मानना है कि गेहूं और आटे की बढ़ती कीमतों ने पाकिस्तान को पहले से ही और गहरी गरीबी में धकेल रखा है तथा 22 लाख टन की यह अनुमानित गिरावट भुखमरी की स्थिति को और भी दर्दनाक बना देगी।
Pakistan-Afghanistan War: गेहूं उत्पादन घटने की मुख्य वजहें
पाकिस्तान (Pakistan-Afghanistan War) में इस बार गेहूं उत्पादन में इतनी बड़ी गिरावट के पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण एक साथ जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ी वजह है लंबे समय तक चला भीषण सूखा। पाकिस्तान मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार 2025 की शुरुआत में देश में औसत से 39 प्रतिशत कम बारिश हुई जिसका सबसे बुरा असर दक्षिणी और वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों पर पड़ा। सूखे के कारण गेहूं की खेती का कुल रकबा 2025-26 में 10.37 मिलियन हेक्टेयर से घटकर मात्र 9.1 मिलियन हेक्टेयर रह गया जो एक बड़ी गिरावट है। इसके अलावा पाकिस्तान सरकार ने 2025-26 के लिए गेहूं का समर्थन मूल्य यानी सपोर्ट प्राइस तय करने में बहुत देरी की। इस अनिश्चितता के कारण अनेक किसान गेहूं बोने को लेकर दुविधा में पड़ गए और बुवाई में कमी आ गई।
Pakistan-Afghanistan War: सिंधु जल समझौते का निलंबन बना बड़ा कारण
पंजाब प्रांत को पाकिस्तान का गेहूं का कटोरा कहा जाता है। यही प्रांत तय करता है कि पाकिस्तानी अवाम का पेट भरेगा या नहीं। इस बार पंजाब में सिंचाई की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई जिसकी एक बड़ी वजह है सिंधु जल समझौते में आई खटास। पिछले साल कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया। इससे नदी स्तर पर डेटा-शेयरिंग बंद हो गई जिसका असर पाकिस्तान की तरबेला और मंगला जैसे प्रमुख जलाशयों के प्रबंधन पर पड़ा। सिंधु नदी प्रणाली से पानी के बहाव में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आ गई। पाकिस्तान की पानी भंडारण क्षमता पहले से ही केवल लगभग 30 दिनों की है जो उसे अत्यंत कमजोर बनाती है। इन सब परिस्थितियों ने मिलकर पंजाब की सिंचित खेती को भारी नुकसान पहुंचाया।
Pakistan-Afghanistan War: दो मोर्चों पर एकसाथ लड़ रहा पाकिस्तान
पाकिस्तान की मुसीबतें यहीं नहीं रुकतीं। खैबर पख्तूनख्वा से लेकर बलोचिस्तान तक गेहूं उत्पादन का एक विशाल क्षेत्र फैला हुआ है। लेकिन इस समय बलोच विद्रोहियों ने अफगानिस्तान के जवाबी हमलों का समर्थन करते हुए अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं जिससे यह पूरा कृषि क्षेत्र अशांत और अस्थिर हो गया है। इस तरह पाकिस्तान एक साथ दो मोर्चों पर जूझ रहा है। एक तरफ अफगानिस्तान और बलोचों से सैन्य संघर्ष और दूसरी तरफ गेहूं उत्पादन में भारी गिरावट से उपजा खाद्य संकट।
Pakistan-Afghanistan War: पाकिस्तान में आटे के दाम आसमान पर
इस पूरे संकट का सीधा असर आम पाकिस्तानी नागरिकों की रसोई पर पड़ रहा है। फरवरी 2026 के अंत तक पाकिस्तान में आटे की कीमतें इलाके और गुणवत्ता के हिसाब से अलग-अलग हैं लेकिन सभी जगह काफी ऊंची हैं। 10 किलो के आटे के थैले की कीमत 890 से 1,500 रुपये से अधिक हो गई है। सबसे अधिक बिकने वाले 20 किलो के थैले की कीमत 1,780 से 1,810 रुपये के बीच है। प्रीमियम चक्की आटे की कीमत 160 से 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। इस्लामाबाद में 10 किलो का थैला 890 से 900 रुपये में मिल रहा है जबकि कराची और लाहौर में यही 905 रुपये से अधिक का है।
कुल मिलाकर अफगानिस्तान से जंग, बलोच विद्रोह, सूखा और सिंधु जल संकट जैसी चुनौतियों ने एकसाथ पाकिस्तान को एक ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है जहां से निकलने का रास्ता फिलहाल बेहद मुश्किल दिखाई दे रहा है।
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