Milking Competition: गिर गाय ने 27 किलो, साहीवाल ने 23 किलो दूध देकर तोड़ा रिकॉर्ड, HF गाय ने 65 किलो दूध से मारी बाजी; देसी नस्लों ने बदली सोच

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Milking Competition: देसी नस्ल की गायों के बारे में आम धारणा यह रही है कि ये औसतन 8 से 10 किलो दूध देती हैं और इसीलिए बहुत से पशुपालक विदेशी नस्ल की जर्सी और होल्स्टीन फ्रिजियन यानी HF गाय को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन राजस्थान में हाल ही में हुए रंगीलो मिल्किंग कॉम्पिटिशन ने इस पुरानी सोच को पूरी तरह बदल दिया। इस प्रतियोगिता में गिर नस्ल की एक गाय ने 26.78 किलो और साहीवाल ने 23 किलो दूध देकर नया बेंचमार्क स्थापित किया। इस मुकाबले ने साबित कर दिया कि सही देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन से देसी नस्ल की गायें भी उत्पादन के नए कीर्तिमान स्थापित कर सकती हैं।

Milking Competition: रंगीलो मिल्किंग कॉम्पिटिशन क्या है?

NDDB डेयरी सर्विसेज ने इस मिल्किंग कॉम्पिटिशन (Milking Competition) का आयोजन किया। यह संस्था राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड यानी NDDB की मालिकाना हक वाली कंपनी है। इस बार यह प्रतियोगिता श्री करण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय जोबनेर, राजस्थान में दो दिनों तक चली। इस कार्यक्रम का मकसद सिर्फ प्रतियोगिता तक सीमित नहीं था बल्कि इसके पीछे एक बड़ा उद्देश्य था — वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन को जमीनी स्तर तक पहुंचाना और पशुपालकों को उनके जानवरों की असली उत्पादन क्षमता से परिचित कराना।

Milking Competition: किस नस्ल ने दिया कितना दूध?

इस प्रतियोगिता (Milking Competition) में देसी और विदेशी दोनों नस्लों की गायों ने भाग लिया। नस्लवार दूध उत्पादन के आंकड़े इस प्रकार रहे। होल्स्टीन फ्रिजियन यानी HF नस्ल की गाय ने 65 किलो दूध देकर सबसे ऊंचा स्थान हासिल किया। जर्सी गाय ने 37 किलो दूध दिया। देसी नस्लों में गिर गाय ने 26.78 किलो दूध देकर अपनी श्रेणी में नया रिकॉर्ड बनाया। राठी नस्ल की गाय ने 18 किलो, थारपारकर ने 14 किलो दूध दिया। साहीवाल गाय ने 23 किलो दूध देकर अपनी श्रेणी में शानदार प्रदर्शन किया। भैंसों की श्रेणी में मुर्रा भैंस ने 23 किलो दूध देकर पहला स्थान हासिल किया।

Milking Competition: गिर गाय के रिकॉर्ड की खास बात

गिर नस्ल की गाय द्वारा 26.78 किलो दूध देना इसलिए और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आमतौर पर देसी गाय इतना दूध नहीं देती। यह गाय अजमेर, राजस्थान के डेयरी किसान मुकेश कुमार चौधरी की थी। उनकी इस गाय ने गिर नस्ल की श्रेणी में नया बेंचमार्क स्थापित किया है। प्रतियोगिता के जानकारों का कहना है कि यह रिकॉर्ड गिर नस्ल की उस क्षमता को सामने लाता है जो उचित पोषण, वैज्ञानिक देखभाल और सही प्रबंधन से हासिल की जा सकती है।

Milking Competition: NDDB चेयरमैन ने क्या कहा?

इस अवसर पर NDDB के चेयरमैन डॉ. मीनेश शाह ने कहा कि रंगीलो सिर्फ एक प्रतियोगिता (Milking Competition) नहीं है बल्कि यह वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की एक ठोस कोशिश है। जब दूध उत्पादन को पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीकों से रिकॉर्ड किया जाता है तो किसानों का आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें अपने पशुओं की असली क्षमता का सही अंदाजा लगाने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि NDDB का लक्ष्य देसी और उन्नत दोनों नस्लों की उत्पादकता बढ़ाकर किसानों की आय में निरंतर वृद्धि सुनिश्चित करना है।

Milking Competition: तीन वैज्ञानिक चरणों में हुई रिकॉर्डिंग

इस प्रतियोगिता (Milking Competition) की एक खास बात यह थी कि दूध उत्पादन की रिकॉर्डिंग तीन वैज्ञानिक चरणों में की गई। इससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हुई। इस पद्धति से पशुपालकों को न केवल अपने पशुओं की वास्तविक उत्पादन क्षमता समझने में मदद मिली बल्कि वे बेहतर प्रबंधन के निर्णय लेने में भी सक्षम हुए।

Milking Competition: लुधियाना और करनाल में भी टूटे रिकॉर्ड

राजस्थान से पहले भी मिल्किंग प्रतियोगिताओं (Milking Competition) में रिकॉर्ड बने थे। पंजाब डेयरी फार्मर्स एसोसिएशन यानी PDFA ने लुधियाना में एक मिल्किंग कॉम्पिटिशन आयोजित किया था जहां HF नस्ल की एक गाय ने 80 किलो दूध देकर पहला इनाम ट्रैक्टर जीता था। इसके बाद नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट करनाल हरियाणा में भी इसी नस्ल की गाय ने 78 किलो दूध देकर पहला स्थान हासिल किया। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में डेयरी क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत हो रही है।

Milking Competition: किसानों के लिए क्या है सीख?

इन प्रतियोगिताओं (Milking Competition) का सबसे बड़ा संदेश यह है कि देसी नस्ल की गायों को कमतर नहीं समझना चाहिए। गिर, साहीवाल, राठी और थारपारकर जैसी देसी नस्लें जलवायु के अनुकूल होती हैं, बीमारियों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है और रखरखाव का खर्च भी कम होता है। यदि इन गायों को संतुलित आहार, साफ पानी, समय पर टीकाकरण और उचित आवास मिले तो ये भी उत्पादन के नए कीर्तिमान स्थापित कर सकती हैं। पशुपालकों को चाहिए कि वे सिर्फ विदेशी नस्लों पर निर्भर न रहकर देसी नस्लों की वैज्ञानिक देखभाल पर भी ध्यान दें।

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