Urea Shortage: भारत सरकार ने यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने का महत्वाकांक्षी वादा किया था और इसकी स्पष्ट डेडलाइन 2025 का अंत तय की गई थी। लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि पूरा साल खत्म हो गया लेकिन यूरिया का संकट और आयात पर निर्भरता जस की तस बरकरार है। बड़ी बड़ी उम्मीदों और दावों के साथ नैनो यूरिया को बाजार में लाया गया था मगर उम्मीद के मुताबिक उससे वह फायदा नहीं मिला जिसकी अपेक्षा की जा रही थी।
आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि पिछले वित्तीय वर्ष भले ही यूरिया इंपोर्ट में 32 प्रतिशत की अस्थायी गिरावट आई हो लेकिन खाद के मामले में दूसरे देशों पर गंभीर निर्भरता अब भी पूरी तरह कायम है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का यूरिया इंपोर्ट रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने का स्पष्ट अनुमान है। पहले 11 महीनों में ही 98 लाख टन से अधिक यूरिया का आयात किया जा चुका है और लगभग 17 लाख टन अभी पाइपलाइन में है। ईरान इजराइल युद्ध और मध्य पूर्व में तनाव के चलते यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है क्योंकि सप्लाई चेन गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
भारत सरकार की यूरिया में आत्मनिर्भरता की महत्वाकांक्षी योजना अब तक जमीन पर नहीं उतर पाई है। यह एक गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि यूरिया भारतीय कृषि की रीढ़ है। बिना यूरिया के फसल उत्पादन संभव नहीं है। देश के करोड़ों किसान अपनी खेती के लिए यूरिया पर निर्भर हैं। लेकिन इस महत्वपूर्ण खाद के उत्पादन में भारत अभी भी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। आयात का बोझ लगातार बढ़ रहा है जो सरकारी खजाने पर भारी दबाव डाल रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आत्मनिर्भरता के वादे का आखिर क्या हुआ? क्यों यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया? आइए विस्तार से समझते हैं।
Urea Shortage: यूरिया में आत्मनिर्भर नहीं बनने की असली वजह
दरअसल यूरिया में आत्मनिर्भर नहीं बन पाने के पीछे सबसे बड़ी और मुख्य वजह गैस और केमिकल जैसे कच्चे माल के लिए आयात पर भारी निर्भरता है। यूरिया बनाने के लिए नेचुरल गैस सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल है। लेकिन भारत में पर्याप्त मात्रा में नेचुरल गैस उपलब्ध नहीं है। घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए जरूरी नेचुरल गैस का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। यह बहुत बड़ी निर्भरता है। जब कच्चा माल ही विदेश से आ रहा है तो तैयार उत्पाद में आत्मनिर्भरता का दावा कितना सही है यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है। ऐसे में एक गंभीर सवाल यह भी उठता है कि क्या भारत दूसरे देशों से गैस और केमिकल मंगाकर सच में यूरिया में आत्मनिर्भर बन सकता है? गैस की इस भारी कमी ने घरेलू उत्पादन में बड़ी बाधा डाली है जिसके परिणामस्वरूप तैयार यूरिया के आयात पर निर्भरता लगातार बढ़ती गई है। तैयार यूरिया आयात करना बहुत महंगा पड़ता है जो सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ाता है।
Urea Shortage: सरकार के वादे और बयान क्या थे?
साल 2024 में तत्कालीन रसायन और उर्वरक मंत्री मनसुख मांडविया ने बड़े विश्वास के साथ कहा था कि 2025 के अंत तक भारत यूरिया का आयात पूरी तरह रोक देगा और देश में ही उत्पादन से इसकी पूरी जरूरत पूरी की जाएगी। उनका बहुत स्पष्ट और साफ बयान था कि मांग और आपूर्ति के बीच जो अंतर है उसे पाटने के लिए सरकार कई ठोस प्रयास और पहल कर रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि इन प्रयासों का बेहतर और सकारात्मक रिजल्ट बहुत जल्द दिखना शुरू हो जाएगा। यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के बारे में विस्तार से पूछे जाने पर मांडविया ने बताया था कि मोदी सरकार ने यूरिया आयात पर निर्भरता खत्म करने के लिए एक दो तरफा रणनीति अपनाई है। पहला सरकार ने चार बंद पड़े पुराने यूरिया प्लांट को फिर से चालू किया है। दूसरा एक और बड़ी फैक्ट्री को भी फिर से चालू करने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन यह सब कागजों पर ही रह गया।
Urea Shortage: भारत को कितनी यूरिया चाहिए?
घरेलू कृषि मांग को पूरा करने के लिए भारत को हर साल लगभग 360 लाख टन यानी 36 मिलियन टन यूरिया की जरूरत होती है। यह बहुत बड़ी मात्रा है। इसमें से भारत में लगभग 300 लाख टन यानी 30 मिलियन टन का घरेलू उत्पादन होता है। यानी करीब 60 लाख टन यूरिया की कमी रहती है जो आयात से पूरी की जाती है। यह लगभग 17 से 18 प्रतिशत निर्भरता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यूरिया आयात बंद करने का दावा और लक्ष्य तो बिल्कुल ठीक और सही है लेकिन उसे धरातल पर सफलतापूर्वक उतारने के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चे माल की जरूरत होगी। यह जरूरत फिलहाल बड़े पैमाने पर विदेशों से ही पूरी हो रही है। इसलिए कच्चे माल के आयात पर निर्भर रहते हुए तैयार उत्पाद में आत्मनिर्भर होना एक बहुत बड़ी चुनौती है। लिहाजा खाद के लिए मारामारी कोई उग्र और हिंसक रूप धारण न कर ले इस डर से 2025 की इस डेडलाइन को सरकार ने सरकारी खाद कंपनियों के पाले में डालते हुए 31 मार्च 2026 तक बढ़ा दिया। अब इस तारीख में भी मुश्किल से केवल 13 दिन बचे हैं। लेकिन हालात पहले की तरह ही किल्लत और कमी वाले बने हुए हैं।
Urea Shortage: ईरान युद्ध ने बढ़ाई चिंता और समस्या
यूरिया को लेकर चिंता और समस्या इसलिए भी कई गुना बढ़ गई है क्योंकि ईरान इजराइल युद्ध जल्द रुकने या शांत होने का कोई नाम नहीं ले रहा है। भारत दुनिया में उर्वरकों और खादों का सबसे बड़ा खरीदार देश है जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा यूरिया का होता है। जरूरी नहीं है कि यह खाद हमेशा तैयार माल के रूप में ही भारत आती हो बल्कि इसे घरेलू स्तर पर बनाने के लिए नेचुरल गैस और विभिन्न केमिकल जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल भी बड़ी मात्रा में विदेशों से खरीदे जाते हैं। यह कच्चा माल मुख्य रूप से फारस की खाड़ी के समुद्री रास्ते से भारत पहुंचता है। इस खाड़ी का एक बेहद अहम और रणनीतिक हिस्सा है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। ईरान जब से युद्ध में फंसा है तब से होर्मुज के जरिये तेल, गैस और केमिकल की सप्लाई गंभीर रूप से प्रभावित और बाधित हुई है। इसने खादों की उपलब्धता के पूरे समीकरण को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। हालांकि यह युद्ध मार्च 2026 में शुरू हुआ है लेकिन भारत में यूरिया के आयात की जरूरत तो पहले से ही बनी हुई थी। तभी फरवरी महीने तक ही लाखों टन यूरिया और कच्चा माल आयात किया जा चुका था। कई बड़े ऑर्डर अभी भी पाइपलाइन में हैं।
Urea Shortage: किन देशों से आता है यूरिया?
भारत अपनी कुल यूरिया जरूरत का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा सीधे तैयार यूरिया के रूप में आयात करता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में चीन और रूस से होने वाला यूरिया आयात तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है जो कुल मिलाकर 35 लाख टन से भी अधिक रहा है। यह एक चिंताजनक आंकड़ा है। यूरिया का लगभग 75 प्रतिशत आयात पारंपरिक रूप से गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल यानी GCC के देशों से होता है। इन प्रमुख सप्लायर देशों में ओमान, सऊदी अरब, रूस और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE भी शामिल हैं। भारत नेचुरल गैस के आयात के लिए भी इन्हीं देशों पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इस गैस का इस्तेमाल घरेलू यूरिया बनाने में एक मुख्य और अनिवार्य कच्चे माल के तौर पर किया जाता है। मध्य पूर्व के देशों पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए भारत अब इंडोनेशिया और बेलारूस जैसे वैकल्पिक स्रोतों की तलाश भी कर रहा है। इसके अलावा भारत ने यूरिया की सप्लाई सुचारू और निर्बाध रखने के लिए चीन से भी संपर्क किया है क्योंकि युद्ध की मौजूदा विकट परिस्थितियों के कारण देश को नेचुरल गैस की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है।
Urea Shortage: विदेशी निर्भरता से आत्मनिर्भरता कैसे संभव
कृषि और उर्वरक विशेषज्ञों की मानें तो सरकारी खजाने पर जो भारी वित्तीय बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है वह तब तक हल्का नहीं हो सकता जब तक भारत विदेशी निर्भरता से पूरी तरह मुक्त होकर सही मायने में आत्मनिर्भरता की श्रेणी में नहीं आता। लेकिन यह बड़ा सवाल है कि ऐसा कब तक होगा और कैसे होगा यह किसी को ठीक से नहीं पता। सरकार ने कई योजनाएं बनाई हैं। पुराने प्लांट दोबारा शुरू किए हैं। नैनो यूरिया लाई गई है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आयात बढ़ता जा रहा है। 98 लाख टन आयात हो चुका है और 17 लाख टन पाइपलाइन में है। यानी कुल मिलाकर 115 लाख टन से अधिक। यह पिछले सालों से अधिक है। ऐसे में आत्मनिर्भरता का दावा खोखला नजर आता है।
Urea Shortage: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत को सालाना कितनी यूरिया चाहिए? भारत को हर साल लगभग 360 लाख टन यूरिया की जरूरत होती है जिसमें से 300 लाख टन घरेलू उत्पादन होता है और 60 लाख टन आयात करना पड़ता है।
यूरिया आत्मनिर्भरता की डेडलाइन क्या थी? पहले 2025 का अंत तय किया गया था जो पूरा नहीं हो सका। फिर 31 मार्च 2026 तक बढ़ाया गया लेकिन वह भी पूरा नहीं होगा।
यूरिया आत्मनिर्भरता क्यों नहीं हो पा रही? मुख्य कारण नेचुरल गैस की कमी है। घरेलू यूरिया बनाने के लिए जरूरी 85 प्रतिशत गैस आयात करनी पड़ती है इसलिए पूर्ण आत्मनिर्भरता संभव नहीं।
ईरान युद्ध का क्या असर है? होर्मुज स्ट्रेट से गैस और केमिकल की सप्लाई प्रभावित हो रही है जिससे यूरिया का आयात और बढ़ सकता है और कीमतें भी बढ़ सकती हैं।
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