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Iran-Isreal War: ईरान-इजरायल युद्ध का कच्चे तेल पर असर, क्या भारत में पेट्रोल-डीजल हो जाएगा महंगा, होर्मुज जलसंधि बंद हुई तो मच जाएगी तबाही, जानें पूरी तस्वीर

Iran-Isreal War
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Iran-Isreal War: मध्य-पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी भीषण जंग (Iran-Isreal War) ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। इस युद्ध की लपटें अब सिर्फ मिसाइलों और बमों तक सीमित नहीं रहीं बल्कि इसका असर वैश्विक कच्चे तेल के बाजार पर भी तेजी से दिखने लगा है। दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक मध्य-पूर्व में जब भी कोई बड़ा संघर्ष होता है तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। भारत जो अपनी कुल जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है उसके लिए यह युद्ध सीधे तौर पर आर्थिक संकट का कारण बन सकता है। अगर होर्मुज जलसंधि बंद हो गई तो पूरी दुनिया में तेल की आपूर्ति ठप पड़ जाएगी और भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि ईरान-इजरायल युद्ध (Iran-Isreal War) से कच्चे तेल के दाम पर क्या असर पड़ेगा और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके क्या परिणाम हो सकते हैं।

Iran-Isreal War: होर्मुज जलसंधि – दुनिया की तेल नस

ईरान-इजरायल युद्ध (Iran-Isreal War) को लेकर सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलसंधि को लेकर है। होर्मुज वह संकरा समुद्री मार्ग है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और इसी रास्ते से दुनिया का करीब 20 से 21 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। हर दिन लगभग 1.7 से 2 करोड़ बैरल तेल इसी रास्ते से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, UAE, कतर और ईरान से निकलने वाला अधिकांश तेल इसी जलसंधि से होकर जाता है।

ईरान ने पहले भी कई बार इस जलसंधि को बंद करने की धमकी दी है और इस बार जब सीधा युद्ध छिड़ा हुआ है तो यह खतरा और भी वास्तविक हो गया है। अगर होर्मुज जलसंधि बंद हो जाती है तो दुनिया के तेल बाजार में भूचाल आ जाएगा। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का अनुमान है कि ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती है जो अभी तक के इतिहास का सर्वोच्च स्तर होगा।

Iran-Isreal War: ईरान खुद है एक बड़ा तेल उत्पादक

यह समझना भी जरूरी है कि ईरान (Iran-Isreal War) खुद दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में से एक है। ईरान रोजाना करीब 30 से 35 लाख बैरल कच्चा तेल उत्पादन करता है और यह OPEC यानी तेल निर्यातक देशों के संगठन का महत्वपूर्ण सदस्य है। युद्ध की स्थिति में ईरान की तेल उत्पादन क्षमता और उसके निर्यात पर सीधा असर पड़ेगा। अमेरिका ने पहले से ही ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं लेकिन युद्ध की परिस्थितियों में ईरान का तेल उत्पादन और भी बाधित हो सकता है। इससे वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति में कमी आएगी और कीमतें बढ़ेंगी।

Iran-Isreal War: पहले ही बढ़ चुकी हैं कीमतें

ईरान पर अमेरिका-इजरायल (Iran-Isreal War) के हमले की खबर आते ही अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार में हलचल मच गई। ब्रेंट क्रूड और WTI यानी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट दोनों की कीमतों में तेज उछाल देखा गया। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा और क्षेत्र में तनाव बना रहा तो कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है। फिलहाल कीमतों में आई तेजी एक संकेत है कि बाजार इस युद्ध को कितनी गंभीरता से ले रहा है।

Iran-Isreal War: भारत पर क्यों पड़ेगा सबसे ज्यादा असर

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता और आयातक देश है। हम अपनी कुल जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाते हैं जिसमें मध्य-पूर्व के देशों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। इराक, सऊदी अरब, UAE और कुवैत भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता हैं। इन सभी देशों से तेल होर्मुज जलसंधि (Iran-Isreal War) के रास्ते ही भारत तक आता है।

इसके अलावा भारत रूस से भी बड़ी मात्रा में रियायती दर पर कच्चा तेल खरीद रहा है। लेकिन अगर मध्य-पूर्व से आपूर्ति बाधित हुई तो रूस का तेल इस कमी को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। ऐसे में भारत को तेल के लिए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी और उन्हें अधिक कीमत पर खरीदना होगा।

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Iran-Isreal War: पेट्रोल-डीजल पर क्या होगा असर

अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है तो भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम में 6 से 8 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो सकती है। अगर कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची तो पेट्रोल 110 से 120 रुपये प्रति लीटर और डीजल 100 रुपये के पार जा सकता है। महानगरों में तो यह और भी महंगा होगा।

हालांकि भारत सरकार कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती जैसे कदम उठा सकती है लेकिन इसकी एक सीमा होती है। अगर कच्चे तेल की कीमत बहुत अधिक समय तक ऊंची रही तो सरकार के पास महंगाई को रोकने के विकल्प सीमित हो जाएंगे।

Iran-Isreal War: अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर

तेल की बढ़ती कीमत का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी आंच हर आम इंसान की रसोई तक पहुंचेगी। परिवहन महंगा होने से सब्जियां, अनाज और अन्य जरूरी सामान की कीमतें बढ़ेंगी। उर्वरक और कीटनाशक महंगे होंगे जिससे खेती की लागत बढ़ेगी। बिजली उत्पादन महंगा होगा जिसका असर उद्योगों पर पड़ेगा। भारत का आयात बिल बढ़ेगा जिससे चालू खाते के घाटे में वृद्धि होगी और रुपये पर दबाव बढ़ेगा। इन सभी कारणों से महंगाई दर में उछाल आ सकता है जो आम नागरिकों की जेब पर सीधी मार होगी।

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Iran-Isreal War: सरकार और तेल कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती

भारत की सरकारी तेल कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम पहले से ही तेल कीमतों के उतार-चढ़ाव से जूझती रही हैं। अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने पर ये कंपनियां घाटे में जाती हैं क्योंकि सरकारी दबाव में वे घरेलू कीमतें नहीं बढ़ा पातीं। ईरान युद्ध (Iran-Isreal War) की वजह से अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहा तो इन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर गंभीर असर पड़ेगा।

Iran-Isreal War: क्या है विशेषज्ञों की राय?

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध (Iran-Isreal War) जल्दी थम जाता है और होर्मुज जलसंधि खुली रहती है तो कीमतों में आई तेजी अस्थायी साबित होगी। लेकिन अगर संघर्ष लंबा खिंचा और खाड़ी के अन्य देश भी इसमें खिंच गए तो स्थिति 1973 के तेल संकट जैसी गंभीर हो सकती है जब कच्चे तेल की कीमत कई गुना बढ़ गई थी और पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी आ गई थी।

भारत के लिए यह संकट एक बड़ी परीक्षा है। सरकार को एक साथ महंगाई को काबू में रखना होगा, तेल कंपनियों को घाटे से बचाना होगा और वैकल्पिक तेल आपूर्ति के रास्ते तलाशने होंगे। आने वाले हफ्तों में मध्य-पूर्व में जो भी घटनाक्रम होगा उसकी सीधी छाया भारतीय बाजार और आम आदमी की जेब पर पड़ेगी।

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