India-US Trade Deal: ट्रेड डील के बाद धड़ाम, सोयाबीन की कीमतों में भारी गिरावट, किसानों की चिंता बढ़ी
India-US Trade Deal: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा के बाद देश की कृषि मंडियों में हलचल मची हुई है। सोयाबीन की कीमतों में अचानक आई गिरावट ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जिन किसानों ने महीनों बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर के दाम देखकर राहत की सांस ली थी, वे अब फिर से संकट में नजर आ रहे हैं। अमेरिका से सोयाबीन ऑयल और डीडीजीएस के सस्ते आयात की आशंका ने बाजार में नकारात्मक भावना पैदा कर दी है।
India-US Trade Deal: एक सप्ताह में 174 रुपये की भारी गिरावट
आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी के दूसरे सप्ताह में सोयाबीन का राष्ट्रव्यापी औसत थोक मूल्य घटकर 5,599.25 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गया। मात्र सात दिन पहले यही कीमत 5,773.03 रुपये थी। यानी एक हफ्ते के भीतर औसतन 174 रुपये की गिरावट दर्ज हुई है। यह गिरावट उस समय आई है जब किसान उम्मीद कर रहे थे कि फसल की कटाई के बाद बाजार में स्थिरता बनी रहेगी।
व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के साथ हुए समझौते (India-US Trade Deal) में सोयाबीन उत्पादों के आयात को लेकर जो संकेत मिले हैं, उससे व्यापारियों ने अपनी रणनीति बदल ली है। आयात की संभावना को देखते हुए बड़े खरीदार अब कम कीमत पर सौदे करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है।
India-US Trade Deal: प्रमुख उत्पादक राज्यों में MSP से नीचे फिसले दाम
चालू खरीफ विपणन सत्र 2025-26 में सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,328 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है। हालांकि राष्ट्रीय औसत अभी भी इससे कुछ ऊपर है, लेकिन प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों की मंडियों में स्थिति चिंताजनक है। मध्य प्रदेश में औसत भाव 5,253.55 रुपये तक गिर गया है, जबकि महाराष्ट्र में तो यह 5,198.90 रुपये तक पहुंच गया है। दोनों ही राज्यों में कीमतें सरकारी समर्थन मूल्य से नीचे चल रही हैं।
सप्ताह भर में राज्यवार गिरावट की बात करें तो महाराष्ट्र में 5.7 प्रतिशत की कमी आई है। तेलंगाना में 5.6 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 5.2 प्रतिशत की नरमी देखी गई। छत्तीसगढ़ में 3.7 प्रतिशत, गुजरात में 2.6 प्रतिशत, राजस्थान और तमिलनाडु में 2.3 प्रतिशत की गिरावट रही। केवल उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य रहा जहां 2.5 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई और औसत कीमत 5,643.85 रुपये रही।
India-US Trade Deal: मध्य प्रदेश की प्रमुख मंडियों का हाल
मध्य प्रदेश सोयाबीन उत्पादन में अग्रणी राज्य है और यहां की मंडियों में जो कीमतें दर्ज हो रही हैं, वे पूरे देश के लिए संकेतक का काम करती हैं। 11 फरवरी को विभिन्न मंडियों में सोयाबीन के दाम काफी अलग-अलग रहे।
छतरपुर की लवकुश नगर मंडी में गैर-एफएक्यू ग्रेड की सोयाबीन 4,200 रुपये पर बिकी। देवास में एफएक्यू ग्रेड 5,000 से 5,170 रुपये के बीच रही, औसत 5,075 रुपये। धार में 4,902 से 5,204 रुपये, इंदौर में 4,110 से 5,215 रुपये तक के सौदे हुए। खंडवा में पीली सोयाबीन 5,031 से 5,151 रुपये में बिकी।
मंदसौर के शामगढ़ में गैर-एफएक्यू सोयाबीन 4,201 से 4,931 रुपये में रही। राजगढ़ के ब्यावरा में 4,665 से 5,040 रुपये, रतलाम के जावरा में 4,880 से 5,330 रुपये के भाव रहे। सागर के बीना में 3,251 से 5,078 रुपये की काफी बड़ी रेंज देखी गई। सीहोर के आष्टा में 4,840 रुपये, शाजापुर के कालापीपल में पीली सोयाबीन 4,991 से 5,366 रुपये में बिकी। शिवपुरी के बदरवास में 5,075 रुपये और उज्जैन में 5,216 रुपये प्रति क्विंटल के सौदे दर्ज किए गए।
इन आंकड़ों से साफ है कि कई मंडियों में कीमतें एमएसपी से काफी नीचे हैं, जिससे किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा।
India-US Trade Deal: मासिक और वार्षिक तुलना में अभी भी बेहतर
हालांकि साप्ताहिक गिरावट चिंताजनक है, लेकिन मासिक आधार पर देखें तो अधिकतर राज्यों में कीमतें जनवरी की तुलना में 5 से 19 प्रतिशत तक ऊंची हैं। यह दर्शाता है कि जनवरी के अंत और फरवरी की शुरुआत में बाजार में काफी तेजी आई थी, जो अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।
वार्षिक आधार पर तुलना करें तो मौजूदा कीमतें पिछले साल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत अधिक हैं। यह पिछले वर्ष के कमजोर भावों को दर्शाता है। लेकिन किसानों के लिए यह तुलना उतनी प्रासंगिक नहीं है, क्योंकि उनकी चिंता वर्तमान समय में उचित दाम मिलने की है।
India-US Trade Deal: उत्पादन लागत और किसानों का वास्तविक लाभ
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के अनुमान के मुताबिक, A2+FL आधार पर सोयाबीन की उत्पादन लागत लगभग 3,552 रुपये प्रति क्विंटल आती है। सरकार द्वारा निर्धारित एमएसपी 5,328 रुपये है, जो लागत से 1,776 रुपये अधिक है। कागज पर यह अच्छा मार्जिन लगता है, लेकिन जब बाजार में कीमतें एमएसपी से नीचे चली जाती हैं, तो किसान इस लाभ से वंचित रह जाते हैं।
कृषि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि A2+FL लागत में केवल नकद खर्च और परिवार के श्रम का मूल्य शामिल होता है। इसमें किसान की अपनी भूमि का किराया, पूंजी पर ब्याज और अन्य अप्रत्यक्ष लागतें शामिल नहीं होतीं। इसलिए वास्तविक लागत इससे काफी अधिक होती है। जब बाजार भाव एमएसपी के आसपास या उससे नीचे चलते हैं, तो किसानों को वास्तव में बहुत कम लाभ या कई बार घाटा भी हो जाता है।
India-US Trade Deal: डीडीजीएस आयात का व्यापक प्रभाव
कमोडिटी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका से डीडीजीएस (Distillers Dried Grains with Solubles) के आयात का असर केवल सोयाबीन तक सीमित नहीं रहेगा। डीडीजीएस का उपयोग पशु आहार में प्रोटीन स्रोत के रूप में किया जाता है, जो सोयाबीन खली का सीधा विकल्प है। अगर सस्ता डीडीजीएस बाजार में आता है, तो सोयाबीन खली की मांग घटेगी, जिससे सोयाबीन की कीमतों पर और दबाव बढ़ेगा।
इसके अलावा, डीडीजीएस (India-US Trade Deal) मक्का आधारित उत्पाद है, इसलिए इसका आयात मक्का उत्पादकों और पशु आहार उद्योग पर भी प्रभाव डालेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे फीड इंडस्ट्री सेक्टर में बदलाव आ सकता है, जिसका असर घरेलू उत्पादकों पर नकारात्मक हो सकता है।
India-US Trade Deal: किसान संगठनों की प्रतिक्रिया
सोयाबीन उत्पादक राज्यों के किसान संगठनों ने व्यापार समझौते (India-US Trade Deal) को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि सरकार ने किसानों से परामर्श किए बिना ऐसे समझौते किए हैं जो उनके हितों के खिलाफ हैं। किसान नेताओं ने मांग की है कि सोयाबीन और संबंधित उत्पादों के आयात पर उचित शुल्क लगाया जाए ताकि घरेलू उत्पादकों को नुकसान न हो।
मध्य प्रदेश के एक किसान नेता ने कहा, “पहले हमें बताया गया कि एमएसपी हमारी सुरक्षा है, लेकिन जब मंडी में भाव एमएसपी से नीचे चले जाते हैं तो कोई खरीद नहीं करता। अब ऊपर से आयात का खतरा आ गया है। सरकार को घरेलू किसानों की रक्षा करनी चाहिए।”
India-US Trade Deal: सरकार का पक्ष और आश्वासन
सरकारी सूत्रों ने कहा है कि व्यापार समझौते (India-US Trade Deal) में भारतीय कृषि के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है। वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि संवेदनशील कृषि उत्पादों को उचित सुरक्षा प्रदान की गई है। उन्होंने कहा कि आयात से घरेलू कीमतों पर जो भी असर पड़ेगा, उस पर नजर रखी जा रही है और जरूरत पड़ने पर उचित कदम उठाए जाएंगे।
हालांकि, किसान संगठन इन आश्वासनों से संतुष्ट नहीं दिख रहे। उनका कहना है कि व्यावहारिक धरातल पर जो प्रभाव दिख रहा है, वह चिंताजनक है और सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।
India-US Trade Deal: बाजार विश्लेषकों की राय
कृषि बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा गिरावट अस्थायी हो सकती है और यह मुख्य रूप से व्यापारियों की धारणा पर आधारित है। वास्तविक आयात अभी शुरू नहीं हुआ है, इसलिए बाजार में केवल अटकलों का असर दिख रहा है। अगर आयात की मात्रा सीमित रहती है तो कीमतें फिर से स्थिर हो सकती हैं।
दूसरी ओर, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह दीर्घकालिक गिरावट की शुरुआत (India-US Trade Deal) हो सकती है। अगर बड़े पैमाने पर सस्ता आयात होता है तो घरेलू बाजार में लंबे समय तक दबाव बना रह सकता है। वे सुझाव देते हैं कि किसानों को अपनी फसल को होल्ड करने की बजाय उचित समय पर बेच देना चाहिए।
India-US Trade Deal: आगे क्या उम्मीद करें?
अगले कुछ हफ्तों में बाजार की दिशा कई कारकों पर निर्भर करेगी। अमेरिका से वास्तविक आयात कब (India-US Trade Deal) और कितनी मात्रा में शुरू होता है, यह सबसे महत्वपूर्ण बात होगी। घरेलू मांग और आपूर्ति की स्थिति, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का रुख, और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदम भी महत्वपूर्ण होंगे।
सोयाबीन किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे बाजार की स्थिति पर नजर रखें और अपने स्थानीय कृषि अधिकारियों से संपर्क में रहें। अगर कीमतें और गिरती हैं तो सरकारी खरीद की मांग को और मजबूती से उठाना होगा।
India-US Trade Deal: प्रमुख बिंदु संक्षेप में
• एक सप्ताह में 174 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट दर्ज
• राष्ट्रीय औसत 5,599.25 रुपये पर आया, पहले 5,773.03 रुपये था
• मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भाव एमएसपी से नीचे
• महाराष्ट्र में 5.7%, तेलंगाना में 5.6% साप्ताहिक गिरावट
• अमेरिका से सोयाबीन ऑयल और डीडीजीएस आयात की आशंका
• मासिक आधार पर जनवरी से 5-19% ऊपर
• वार्षिक आधार पर पिछले साल से 30% मजबूत
• एमएसपी 5,328 रुपये, उत्पादन लागत लगभग 3,552 रुपये
• डीडीजीएस आयात से मक्का और खल पर भी दबाव की आशंका
• किसान संगठनों ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की
India-US Trade Deal: विशेषज्ञों की सलाह
कृषि विशेषज्ञ किसानों को सुझाव दे रहे हैं कि वे अपनी उपज को उचित भंडारण में रखें और बाजार की स्थिति देखते हुए धीरे-धीरे बिक्री करें। एक साथ बड़ी मात्रा में बेचने से बाजार में और दबाव बन सकता है। साथ ही, किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे अगली फसल के लिए फसल विविधीकरण पर विचार करें और केवल एक फसल पर निर्भर न रहें।
नोट: यह विश्लेषण विभिन्न बाजार स्रोतों और सरकारी आंकड़ों पर आधारित है। कीमतों में उतार-चढ़ाव बाजार की स्थिति के अनुसार जारी रह सकता हैं।
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