Site icon

Baadh Ke Baad Kheton Mein Kya Karein? पूरी जानकारी

Baadh ke baad kheton mein kya karein - फसल बचाने के उपाय

Baadh ke baad kheton mein kya karein? 90% किसान करते हैं ये गलती

आज के 3 सबसे जरूरी काम

  1. खेत से अतिरिक्त पानी जल्द से जल्द बाहर निकलें।
  2. खराब फसल को देखकर ही दोबारा बुवाई या रोपाई का फैसला करें।
  3. मिट्टी की जांच के बाद ही खाद और उर्वरक की मात्रा तय करें।

Baadh ke baad kheton mein kya karein? फसल बचाने के आसान और वैज्ञानिक उपाय

बाढ़ का पानी उतरने के बाद किसान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि baadh ke baad kheton mein kya karein, ताकि बची हुई फसल को बचाया जा सके और खराब हो चुकी जमीन को दोबारा खेती के लायक बनाया जा सके। खेत में कई दिनों तक पानी खड़ा है, मिट्टी की संरचना प्रभावित होती है और कई पोषक तत्व पानी के साथ बह सकता हैं।

लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है। अगर किसान पानी उतरने के बाद खेत का निरीक्षण करके सही क्रम में काम शुरू करें, तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए जल निकासी, फसल प्रबंधन, वैकल्पिक फसलों और मिट्टी की सेहत पर विशेष जोर दिया है। बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में ICAR के अध्ययन में मक्का, मसूर, सरसों और कुछ सब्जियों जैसी वैकल्पिक फसलों को अपनाने से किसानों को दोबारा खेती शुरू करने में मदद मिली है।

Baadh ke baad kheton mein kya karein?

Baadh ke baad kheton mein kya karein यह सवाल हर बाढ़ प्रभावित किसान के लिए महत्वपूर्ण है। इसका जवाब एक ही नहीं है, क्योंकि खेत की स्थिति, फसल की उम्र, पानी कितने दिन खड़ा रहा और मिट्टी की हालत के अनुसार प्रबंधन बदल सकता है।

सबसे पहले खेत में जाकर यह देखें कि कितना पानी बचा है, फसल कितनी क्षतिग्रस्त है और मिट्टी पर गाद या रेत की कितनी परत जमा हुई है। इसके बाद ही अगला कदम उठाएं।

1. खेत से जमा पानी की निकासी करें

बाढ़ के बाद सबसे पहला काम अतिरिक्त पानी निकालना होना चाहिए। लंबे समय तक खेत में पानी खड़ा रहने से जड़ों तक हवा और ऑक्सीजन की उपलब्धता कम हो जाती है। इससे पौधे पीले पड़ सकते हैं और जड़ सड़ने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

जहां संभव हो, वहां खेत की मेड़ या निकासी नाली को व्यवस्थित करके पानी बाहर निकालें। लेकिन पानी निकालते समय ऐसा रास्ता न बनाएं जिससे खेत की उपजाऊ मिट्टी भी बहने लगे।

ICAR-MGIFRI, मोतिहारी ने भी बाढ़ और जलभराव वाले क्षेत्रों में उचित जल निकासी, खेत का समतलीकरण और जल प्रबंधन अपनाने पर जोर दिया है।

2. बची हुई फसल का ध्यान से निरीक्षण करें

पानी निकलने के बाद तुरंत खेत की जुताई करने की गलती न करें।

अगर पौधा हरा है, तना मजबूत है और नई बढ़वार की संभावना दिखाई दे रही है तो उसे कुछ समय देकर बचाया जा सकता है। दूसरी ओर, अगर पौधे पूरी तरह गल चुके हैं, जड़ें सड़ गई हैं या फसल दोबारा बढ़ने की स्थिति में नहीं है तो उस खेत में वैकल्पिक फसल लगाने की योजना बनाना बेहतर हो सकता है।

हर खेत में एक जैसा फैसला लेना सही नहीं होता।

3. गाद और रेत की परत को पहचानें

बाढ़ का पानी कई बार अपने साथ मिट्टी, रेत और दूसरी सामग्री लेकर आता है। कुछ खेतों में यह जमा होकर पौधों की जड़ों को ढक सकती है।

अगर खेत में मोटी रेत या गाद की परत जमा हो गई है तो उसकी स्थिति का आकलन करें। बहुत ज्यादा रेत जमा होने पर स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेना बेहतर रहेगा।

ICAR ने बाढ़ के बाद प्रभावित खेतों में मिट्टी की बहाली, खेत की समतलीकरण और उपयुक्त कृषि मशीनरी के इस्तेमाल को महत्वपूर्ण बताया है।

4. बाढ़ के तुरंत बाद ज्यादा खाद न डालें

कई किसान सोचते हैं कि बाढ़ के बाद फसल कमजोर हो गई है, इसलिए तुरंत यूरिया या दूसरी खाद की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए। ऐसा करना हमेशा सही नहीं होता।

बाढ़ के बाद मिट्टी की वास्तविक स्थिति समझना जरूरी है। बिना जांच के ज्यादा उर्वरक डालने से खर्च बढ़ सकता है और पौधों को नुकसान भी हो सकता है।

ICAR-MGIFRI ने बिहार के किसानों को मृदा परीक्षण आधारित और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है। जैविक खाद, हरी खाद और जैव उर्वरकों को भी उचित तरीके से कृषि व्यवस्था में शामिल करने पर जोर दिया गया है।

5. मिट्टी की जांच जरूर कराएं

बाढ़ के बाद खेत की मिट्टी पहले जैसी रहे, यह जरूरी नहीं है। पानी के बहाव से पोषक तत्वों में बदलाव हो सकता है और कुछ खेतों में मिट्टी की संरचना भी प्रभावित हो सकती है।

इसलिए अगर संभव हो तो मृदा परीक्षण करवाएं। रिपोर्ट के आधार पर ही पोषक तत्वों की जरूरत तय करें।

खासकर बार-बार बाढ़ या जलभराव वाले खेतों में लंबे समय के लिए मिट्टी की सेहत पर ध्यान देना जरूरी है। ICAR के अनुसार संतुलित पोषण, जैविक पदार्थ, हरी खाद और फसल विविधीकरण मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकते हैं।

फसल खराब हो गई है तो क्या करें?

अगर बाढ़ से खड़ी फसल पूरी तरह खराब हो चुकी है तो किसान को नुकसान देखकर परेशान होने के बजाय अगली फसल की योजना जल्दी बनानी चाहिए।

यहां सबसे जरूरी बात है कि अगली फसल का चुनाव खेत की नमी और मौसम को देखकर किया जाए।

ICAR के बाढ़ प्रभावित बिहार क्षेत्रों के अध्ययन में बाढ़ के बाद परिस्थितियों के अनुसार मक्का, मसूर, सरसों, बैंगन, टमाटर, खीरा, गोभी और फूलगोभी जैसी वैकल्पिक फसलों पर काम किया गया। समय पर वैकल्पिक फसल लगाने से प्रभावित किसानों को दोबारा उत्पादन शुरू करने में मदद मिली।

ध्यान रखें: कौन-सी फसल लगानी है, यह आपके जिले, मिट्टी, पानी की उपलब्धता और बुवाई के समय पर निर्भर करेगा।

बाढ़ के बाद दोबारा बुवाई कब करें?

दोबारा बुवाई का फैसला केवल कैलेंडर देखकर नहीं करना चाहिए।

जब खेत से अतिरिक्त पानी निकल जाए और मिट्टी खेती योग्य स्थिति में आ जाए, तभी खेत की तैयारी शुरू करें। बहुत ज्यादा गीली मिट्टी में भारी मशीन चलाने से मिट्टी की संरचना खराब हो सकती है।

मिट्टी में पर्याप्त नमी हो लेकिन पानी जमा न हो, ऐसी स्थिति दोबारा खेती के लिए ज्यादा उपयुक्त हो सकती है।

किसान अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से स्थानीय फसल कैलेंडर के अनुसार सलाह ले सकते हैं।

सब्जियों की खेती का विकल्प भी देख सकते हैं

जहां बाढ़ के बाद खेत की स्थिति अनुकूल हो और मौसम साथ दे, वहां किसान स्थानीय सलाह के अनुसार सब्जियों की खेती पर भी विचार कर सकते हैं।

ICAR के बाढ़ उपरांत अध्ययन में टमाटर, बैंगन, खीरा, गोभी और फूलगोभी जैसी सब्जियों को वैकल्पिक फसल के रूप में अपनाया गया था।

हालांकि किसान को बाजार की मांग, बीज की उपलब्धता, सिंचाई और स्थानीय मौसम को ध्यान में रखकर ही फैसला लेना चाहिए।

फसल में रोग और कीट पर रखें नजर

बाढ़ के बाद खेत का वातावरण लंबे समय तक नम रहने के कारण फसल में रोग और कीट की समस्या बढ़ सकती है।

इसलिए किसान रोजाना खेत का निरीक्षण करें। पत्तियों पर असामान्य धब्बे, पौधों का अचानक मुरझाना, तने पर सड़न या कीटों की संख्या बढ़ना जैसे संकेत दिखाई दें तो तुरंत स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें।

बिना पहचान के किसी भी कीटनाशक का छिड़काव न करें।

दवा की मात्रा हमेशा उसके लेबल और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही रखें।

बाढ़ के बाद खेत की मिट्टी कैसे सुधारें?

बाढ़ प्रभावित खेत को दोबारा उपजाऊ बनाने में समय लग सकता है। इसके लिए किसान जैविक खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद जैसी विधियों को अपनी कृषि व्यवस्था में शामिल कर सकते हैं।

ICAR-MGIFRI ने बिहार के बाढ़ और जलभराव वाले क्षेत्रों में हरी खाद, जैव उर्वरक, जैविक इनपुट, फसल अवशेषों के पुनर्चक्रण और संतुलित पोषण पर विशेष जोर दिया है।

हरी खाद के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ढैंचा जैसी फसल उपयोगी विकल्प हो सकती है। लेकिन इसकी मात्रा और प्रबंधन स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार करना चाहिए।

बार-बार बाढ़ वाले खेतों में क्या करें?

अगर आपका खेत हर साल या बार-बार बाढ़ की चपेट में आता है तो केवल हर साल नुकसान के बाद फसल लगाने के बजाय लंबी अवधि की कृषि योजना बनाना जरूरी है।

खेत का समतलीकरण, बेहतर जल निकासी, मजबूत मेड़, उचित फसल चयन और फसल विविधीकरण इसमें मददगार हो सकते हैं।

बिहार के लिए ICAR ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में उपयुक्त किस्मों, जल प्रबंधन और फसल विविधीकरण जैसी तकनीकी रणनीतियों पर जोर दिया है।

कुछ क्षेत्रों में एकीकृत कृषि प्रणाली भी उपयोगी विकल्प हो सकती है, जिसमें फसल के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसी गतिविधियों को जोड़ा जाता है। ICAR-MGIFRI ने उत्तर बिहार के जलभराव और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए ऐसे मॉडल पर भी जोर दिया है।

फसल नुकसान का रिकॉर्ड जरूर रखें

बाढ़ से फसल खराब होने के बाद किसान को नुकसान का रिकॉर्ड रखना चाहिए। खेत की फोटो और वीडियो, फसल का क्षेत्रफल, नुकसान की स्थिति और उपलब्ध अन्य संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखें।

अगर किसान किसी फसल बीमा योजना में शामिल है तो संबंधित नियमों के अनुसार नुकसान की सूचना देने की प्रक्रिया पूरी करें। फसल बीमा से जुड़ी कार्रवाई के लिए अपने बीमा दस्तावेज और स्थानीय कृषि विभाग/संबंधित अधिकारी की जानकारी को प्राथमिकता दें।

ICAR ने बाढ़ के पानी की अवधि और क्षेत्रफल के आकलन को फसल बीमा के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण बताया है।

किसानों के लिए आसान 7 स्टेप वाला प्लान

अगर आप सोच रहे हैं कि baadh ke baad kheton mein kya karein, तो इसे इन 7 आसान कदमों में समझ सकते हैं:

पहला कदम: खेत से अतिरिक्त पानी निकालें।

दूसरा कदम: बची हुई फसल और जड़ों की स्थिति देखें।

तीसरा कदम: रेत और गाद की मात्रा का आकलन करें।

चौथा कदम: बिना जांच के ज्यादा खाद न डालें।

पांचवां कदम: जरूरत पड़ने पर मिट्टी की जांच कराएं।

छठा कदम: खराब फसल की जगह मौसम के अनुसार वैकल्पिक फसल चुनें।

सातवां कदम: फसल नुकसान का फोटो और अन्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।

यानी किसान को जल्दबाजी में कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे खेत की मिट्टी और ज्यादा खराब हो जाए। थोड़ा धैर्य रखो, खेत को समझो और फिर फैसला लो- यही समझदारी वाली खेती है।

बाढ़ के बाद खेत को दोबारा कैसे तैयार करें?

बाढ़ के बाद खेती को पटरी पर लाना चुनौती जरूर है, लेकिन सही प्रबंधन से इसे काफी हद तक संभाला जा सकता है। जल निकासी, फसल का निरीक्षण, मिट्टी की जांच, संतुलित पोषण और सही समय पर वैकल्पिक फसल का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण कदम हैं।

ICAR के अनुभव बताते हैं कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में वैज्ञानिक फसल प्रबंधन और समय पर वैकल्पिक खेती किसानों की आय और कृषि लचीलापन बढ़ाने में मदद कर सकती है।

इसलिए बाढ़ का पानी उतरने के बाद किसान केवल नुकसान गिनने में समय न लगाएं। खेत की स्थिति देखें, स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें और अगली फसल की योजना समय रहते बनाएं।

आखिर खेत किसान की सबसे बड़ी पूंजी है। खेत संभल गया तो अगली फसल के साथ उम्मीद भी फिर से खड़ी हो जाएगी।

FAQ- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. बाढ़ के बाद खेत में सबसे पहले क्या करना चाहिए?

सबसे पहले खेत से अतिरिक्त पानी निकालना चाहिए। इसके बाद फसल, मिट्टी और खेत में जमा गाद या रेत की स्थिति का निरीक्षण करें।

2. क्या बाढ़ के बाद तुरंत यूरिया डालना चाहिए?

नहीं। बिना मिट्टी और फसल की स्थिति समझे तुरंत अधिक यूरिया डालना उचित नहीं है। मृदा परीक्षण और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर उर्वरक का इस्तेमाल करें।

3. बाढ़ में फसल पूरी तरह खराब हो जाए तो क्या करें?

अगर फसल दोबारा बढ़ने की स्थिति में नहीं है तो खेत की स्थिति और मौसम के अनुसार वैकल्पिक फसल लगाने की योजना बनाई जा सकती है।

4. बाढ़ के बाद कौन-सी फसल लगाई जा सकती है?

यह क्षेत्र और मौसम पर निर्भर करता है। ICAR के अध्ययन में प्रभावित क्षेत्रों में मक्का, मसूर, सरसों और कुछ सब्जियों को वैकल्पिक फसल के रूप में अपनाया गया था।

5. क्या बाढ़ के बाद मिट्टी की जांच जरूरी है?

हां, खासकर जब खेत में लंबे समय तक पानी रहा हो या मिट्टी की स्थिति बदल गई हो। मिट्टी की जांच से पोषक तत्वों की वास्तविक जरूरत समझने में मदद मिलती है।

6. बाढ़ के बाद खेत में रोग क्यों बढ़ सकते है?

लंबे समय तक नमी और जलभराव के कारण पौधों की जड़ें कमजोर हो सकती हैं और कुछ रोगों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं। इसलिए फसल की नियमित निगरानी जरूरी है।

7. बाढ़ प्रभावित किसान कहां से कृषि सलाह लें?

किसान अपने कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विश्वविद्यालय या ICAR से जुड़े संबंधित संस्थान से स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सलाह ले सकते हैं।

Exit mobile version