Urea-vs-Soil-Health: पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और तनाव ने भारत में खाद संकट की आशंका पैदा कर दी है। हम अपनी यूरिया और फास्फेटिक उर्वरक की लगभग 40 प्रतिशत जरूरत इन्हीं क्षेत्रों से आयात करते हैं। इस स्थिति का फायदा उठाकर बाजार में जमाखोरी और कालाबाजारी शुरू हो गई है। लेकिन असली समस्या सिर्फ सप्लाई की कमी नहीं है। सबसे बड़ी समस्या यूरिया का अंधाधुंध (Urea-vs-Soil-Health) और गलत इस्तेमाल है, जो हमारी मिट्टी की सेहत बिगाड़ रहा है और लंबे समय में पैदावार को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने राज्यों को कड़े निर्देश दिए हैं कि यूरिया की तस्करी और जमाखोरी (Urea-vs-Soil-Health) पर सख्त नकेल कसी जाए। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि खाद संकट से निपटने के लिए सिर्फ आपूर्ति बढ़ाना काफी नहीं। हमें मिट्टी की सेहत सुधारने और यूरिया पर निर्भरता (Urea-vs-Soil-Health) कम करने की दिशा में काम करना होगा।
Urea-vs-Soil-Health: यूरिया की लत और मिट्टी का बिगड़ता गणित
आज भारतीय खेतों में यूरिया का इस्तेमाल (Urea-vs-Soil-Health) जरूरत से कहीं ज्यादा हो रहा है। किसानों में यह गलतफहमी घर कर गई है कि जितना ज्यादा यूरिया डालेंगे, फसल उतनी ही हरी-भरी और भारी होगी। हकीकत इसके ठीक उलट है।
वैज्ञानिक पैमाने के अनुसार खाद का आदर्श अनुपात 4:2:1 (नाइट्रोजन : फास्फोरस : पोटाश) होना चाहिए। लेकिन आज यह अनुपात बिगड़कर 9.3 : 3.5 : 1 के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। हम सिर्फ नाइट्रोजन (यूरिया) पर जोर दे रहे हैं, जबकि फास्फोरस और पोटाश की कमी हो रही है।
आईसीएआर-आरसीएआर पटना के भूमि और जल प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष उपाध्याय कहते हैं कि यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन खत्म कर रहा है। इससे मिट्टी की उर्वरता घट रही है, पानी सोखने की क्षमता कम हो रही है और फसलें कमजोर हो रही हैं। अगर यही सिलसिला जारी रहा तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ बंजर जमीन बच जाएगी।
Urea-vs-Soil-Health: मिट्टी को स्वस्थ बनाने के देसी उपाय
मिट्टी की खोई हुई जान वापस लौटाने के लिए हरी खाद (Green Manure) सबसे अच्छा और सस्ता तरीका है। ढैंचा (Sesbania) या सनई (Crotalaria) जैसी फसलें खेत में उगाकर उन्हें रोपाई से पहले जोत देने से मिट्टी में नाइट्रोजन (Urea-vs-Soil-Health) की मात्रा बढ़ती है।
डॉ. आशुतोष उपाध्याय बताते हैं कि धान की रोपाई से पहले अगर खेत में ढैंचा उगाकर उसे वहीं जोत दिया जाए तो मिट्टी को कुदरती नाइट्रोजन मिलती है। इससे रासायनिक यूरिया की जरूरत 40-50 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। ढैंचा की जड़ें हवा से नाइट्रोजन खींचकर जमीन में जमा करती हैं। अच्छी क्वालिटी के बीज और सही समय पर इस्तेमाल करने से यह तरीका बहुत प्रभावी साबित होता है।
Urea-vs-Soil-Health: वॉटर सॉल्यूबल फर्टिलाइजर और फर्टिगेशन
पुरानी पद्धति में हम यूरिया या डीएपी की बोरियां (Urea-vs-Soil-Health) खेत में छिड़क देते हैं, लेकिन उसका सिर्फ 30-40 प्रतिशत हिस्सा ही पौधों को मिल पाता है। बाकी खेत में बर्बाद होकर मिट्टी और पानी को जहरीला बनाता है।
इसके मुकाबले पानी में घुलनशील खाद (Water Soluble Fertilizer) का इस्तेमाल बहुत बेहतर है। इसे ड्रिप सिंचाई के साथ ‘फर्टिगेशन’ (पानी के साथ खाद देना) के जरिए इस्तेमाल करने पर पौधे 80-85 प्रतिशत खाद सोख लेते हैं। इससे खाद की लागत आधी हो जाती है और पैदावार डेढ़ गुना तक बढ़ सकती है।
Urea-vs-Soil-Health: सरकार और किसानों की जिम्मेदारी
खेती को बचाने के लिए सिर्फ किसान का पसीना काफी नहीं है। सरकारी तंत्र की नीयत और नीति (Urea-vs-Soil-Health) दोनों साफ होनी चाहिए। अक्सर किसानों की शिकायत रहती है कि ढैंचा के बीज या जैविक खाद पर मिलने वाली सब्सिडी और सुविधाएं उन्हें समय पर नहीं मिलतीं।
जब किसान को सही विकल्प समय पर नहीं मिलता तो वह मजबूरन महंगी रासायनिक खाद खरीदता है। बदलाव तभी आएगा जब कृषि विभाग दफ्तरों से निकलकर खेतों तक पहुंचेगा और किसानों को जागरूक करेगा।
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और आत्मा (ATMA) जैसी संस्थाओं को इस दिशा में विशेष जोर देना होगा। जब किसान अपनी आंखों से देखेगा कि जैविक तरीके से फसल की चमक और स्वाद बढ़ रहा है, तो वह खुद ही यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल छोड़ देगा।
Urea-vs-Soil-Health: एक तीर से दो निशाने
यूरिया पर निर्भरता कम करने से दो बड़े फायदे होंगे:
- मिट्टी की सेहत सुधरेगी और पैदावार लंबे समय तक बनी रहेगी।
- देश का अरबों रुपये का खाद आयात बिल कम होगा।
सरकार को लक्ष्य रखना चाहिए कि आने वाले वर्षों में कम से कम 50 प्रतिशत रासायनिक खाद की जगह जैविक और बायो-फर्टिलाइजर (Urea-vs-Soil-Health) का इस्तेमाल हो। इसके लिए रोडमैप तैयार करने की जरूरत है।
Urea-vs-Soil-Health: किसानों के लिए व्यावहारिक सुझाव
- मिट्टी की जांच करवाएं और उसी के अनुसार खाद डालें।
- ढैंचा या सनई जैसी हरी खाद को अपनाएं।
- ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन का इस्तेमाल बढ़ाएं।
- फसल अवशेष (पराली) को खेत में ही कंपोस्ट बनाएं।
- जैविक खाद और नैनो उर्वरकों का उपयोग करें।
Urea-vs-Soil-Health: निष्कर्ष
यूरिया का अंधा मोह हमारी मिट्टी (Urea-vs-Soil-Health) और भविष्य दोनों को खतरे में डाल रहा है। अब समय आ गया है कि हम खाद के इस्तेमाल में बदलाव लाएं। सरकार को भी पारदर्शी वितरण व्यवस्था के साथ-साथ जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा।
किसान भाइयों से अपील है कि वे मिट्टी की जांच करवाएं, हरी खाद अपनाएं और यूरिया (Urea-vs-Soil-Health) का संतुलित इस्तेमाल करें। तभी हमारी खेती टिकाऊ बनेगी और आने वाली पीढ़ियां भी उपजाऊ जमीन पा सकेंगी।
यूरिया और मिट्टी स्वास्थ्य से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Urea-vs-Soil-Health)
1. यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल (Urea-vs-Soil-Health) क्यों नुकसानदायक है?
यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन खत्म करता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और पानी सोखने की क्षमता कम हो जाती है।
2. खाद का आदर्श अनुपात क्या होना चाहिए?
नाइट्रोजन : फास्फोरस : पोटाश का अनुपात 4:2:1 होना चाहिए। लेकिन आज यह 9.3 : 3.5 : 1 तक बिगड़ चुका है।
3. ढैंचा खाद क्या है और कैसे फायदेमंद है?
ढैंचा हरी खाद है। इसे उगाकर खेत में जोत देने से मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ती है और रासायनिक यूरिया की जरूरत 40-50% कम हो जाती है।
4. फर्टिगेशन क्या है?
ड्रिप सिंचाई के साथ पानी में घुलनशील खाद देने की विधि है। इससे खाद 80-85% तक पौधों द्वारा सोख ली जाती है।
5. सरकार क्या कर रही है?
सरकार यूरिया की जमाखोरी पर नकेल कस रही है और जैविक खाद को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी और जागरूकता अभियान चला रही है।
नोट: खाद संबंधी सलाह (Urea-vs-Soil-Health) के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारी से संपर्क करें। मिट्टी परीक्षण करवाकर ही खाद डालें।
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