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  • खेत तालाब योजना 2025: किसानों को 90% सब्सिडी, ऐसे करें आवेदन

    खेत तालाब योजना 2025: किसानों को 90% सब्सिडी, ऐसे करें आवेदन

    किसानों के लिए बड़ी राहत: खेत-तालाब योजना में 90% तक सब्सिडी, ऐसे करें आवेदन


    मध्यप्रदेश के किसानों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। राज्य सरकार द्वारा संचालित खेत-तालाब योजना किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और खेती के साथ अतिरिक्त आय के नए रास्ते खोलने में अहम भूमिका निभा रही है। खासतौर पर मत्स्य पालन से जुड़े किसानों के लिए यह योजना किसी वरदान से कम नहीं मानी जा रही है, क्योंकि इसके तहत खेत में तालाब निर्माण पर 90 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। सरकार का उद्देश्य है कि किसान सिर्फ परंपरागत खेती तक सीमित न रहें, बल्कि जल संरक्षण, सिंचाई सुविधा और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों से अपनी आमदनी बढ़ा सकें।

    राज्य सरकार लगातार किसानों और ग्रामीण हितग्राहियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नई-नई जनकल्याणकारी योजनाएं चला रही है। इन्हीं प्रयासों के तहत मत्स्य विभाग द्वारा खेत-तालाब योजना को लागू किया गया है। यह योजना इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि इससे एक ही समय में कई फायदे मिलते हैं। खेत में बना तालाब वर्षा जल के संरक्षण में मदद करता है, सूखे के समय सिंचाई का विकल्प देता है और मत्स्य पालन के जरिए नियमित आमदनी का साधन भी बनता है। आज के समय में जब खेती लागत बढ़ती जा रही है, ऐसे में यह योजना किसानों के लिए आर्थिक संबल साबित हो रही है।

    सरकार ने इस योजना की शुरुआत किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें बहुआयामी कृषि गतिविधियों से जोड़ने के उद्देश्य से की है। योजना के तहत किसानों को लगभग एक हेक्टेयर भूमि क्षेत्र में तालाब निर्माण के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है। तालाब बनने के बाद किसान इसमें बारिश का पानी इकट्ठा कर सकते हैं, जिससे सिंचाई की समस्या काफी हद तक दूर हो जाती है। इसके साथ ही तालाब में मछली पालन कर किसान साल भर अतिरिक्त आमदनी कमा सकते हैं। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इस योजना के प्रति किसानों की रुचि तेजी से बढ़ रही है।

    खेत-तालाब योजना का एक अहम पहलू यह भी है कि इससे जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। बारिश के पानी को तालाब में संग्रहित करने से भूजल स्तर में सुधार होता है और आसपास के खेतों को भी लाभ मिलता है। सरकार का मानना है कि यह योजना खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। साथ ही इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं, क्योंकि तालाब निर्माण और मत्स्य पालन से जुड़े कामों में स्थानीय लोगों को काम मिलता है।

    इस योजना के तहत अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के किसानों को विशेष लाभ दिया जा रहा है। राज्य सरकार का फोकस आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने पर है। इसी कारण एसटी वर्ग के किसानों को अधिकतम सब्सिडी का प्रावधान किया गया है, ताकि वे कम लागत में तालाब बनवाकर स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकें। सरकार का मानना है कि इससे आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर पैदा होंगे और पलायन की समस्या भी कम होगी।

    सब्सिडी की बात करें तो खेत-तालाब योजना के तहत तालाब निर्माण की कुल लागत का 90 प्रतिशत तक अनुदान सरकार द्वारा दिया जाता है। शेष 10 प्रतिशत राशि किसान को स्वयं वहन करनी होती है, जिसे वह अपनी बचत या फिर बैंक ऋण के माध्यम से पूरा कर सकता है। इस व्यवस्था से किसानों पर आर्थिक बोझ बहुत कम पड़ता है और वे आसानी से अपने खेत में तालाब बनवा पाते हैं। यही वजह है कि यह योजना छोटे और मध्यम किसानों के लिए भी बेहद उपयोगी साबित हो रही है।

    योजना का लाभ उठाने के लिए किसानों को कुछ पात्रता शर्तें पूरी करनी होती हैं। सबसे पहले आवेदक का मध्यप्रदेश का स्थायी निवासी होना जरूरी है। इसके अलावा किसान के पास लगभग एक हेक्टेयर कृषि भूमि होनी चाहिए। यह भूमि आवेदक के नाम पर दर्ज हो या वैध रूप से उसके उपयोग में होनी चाहिए। सरकार द्वारा तय की गई इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि योजना का लाभ सही और पात्र किसानों तक ही पहुंचे। पात्रता पूरी होने के बाद ही आवेदन को स्वीकृति दी जाती है।

    अगर दस्तावेजों की बात करें तो आवेदन के समय किसानों को कुछ जरूरी कागजात जमा करने होते हैं। इनमें आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक की कॉपी, समग्र आईडी, भूमि से जुड़े दस्तावेज और एसटी वर्ग के किसानों के लिए जाति प्रमाण पत्र शामिल हैं। सभी दस्तावेजों का सही और अद्यतन होना आवश्यक है, ताकि आवेदन प्रक्रिया में किसी तरह की परेशानी न हो। विभाग द्वारा दस्तावेजों की जांच के बाद ही योजना का लाभ दिया जाता है।

    खेत-तालाब योजना में आवेदन की प्रक्रिया फिलहाल ऑफलाइन रखी गई है। इच्छुक किसानों को अपने जिले के मत्स्य विभाग कार्यालय में जाकर संपर्क करना होता है। वहां से आवेदन फॉर्म प्राप्त कर किसान को सभी जरूरी जानकारियां सावधानीपूर्वक भरनी होती हैं। इसके बाद आवश्यक दस्तावेजों के साथ फॉर्म को कार्यालय में जमा करना होता है। आवेदन जमा होने के बाद विभाग द्वारा जांच की जाती है और यदि किसान पात्र पाया जाता है, तो उसे योजना का लाभ प्रदान किया जाता है। इसके बाद तालाब निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाती है।

    किसानों के लिए यह योजना इसलिए भी फायदेमंद मानी जा रही है क्योंकि इससे सिर्फ सिंचाई की समस्या का समाधान ही नहीं होता, बल्कि मत्स्य पालन से स्थायी आय का स्रोत भी तैयार होता है। एक बार तालाब बन जाने के बाद किसान हर साल मछली उत्पादन से अच्छी कमाई कर सकते हैं। इससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और वे खेती में नई तकनीकों को अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित होते हैं।

    कुल मिलाकर, खेत-तालाब योजना मध्यप्रदेश के किसानों के लिए एक बहुउद्देश्यीय योजना है, जो जल संरक्षण, सिंचाई सुविधा, मत्स्य पालन और रोजगार सृजन जैसे कई लक्ष्यों को एक साथ पूरा करती है। सरकार की यह पहल किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। अगर आप भी मध्यप्रदेश के किसान हैं और खेती के साथ अतिरिक्त आय का जरिया तलाश रहे हैं, तो खेत-तालाब योजना आपके लिए एक बेहतरीन अवसर साबित हो सकती है।

  • Mini Tractor Subsidy 2025: किसानों को मिलेगा 2.25 लाख तक अनुदान, ऐसे करें आवेदन

    Mini Tractor Subsidy 2025: किसानों को मिलेगा 2.25 लाख तक अनुदान, ऐसे करें आवेदन

    मिनी ट्रैक्टर पर बंपर सब्सिडी: छोटे किसानों के लिए खेती होगी आसान, मिलेंगे 2.25 लाख रुपये तक का लाभ


    अगर आप किसान हैं और खेती के काम को आसान बनाने के लिए ट्रैक्टर खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद अहम है। सरकार ने छोटे और सीमांत किसानों को बड़ी राहत देते हुए मिनी ट्रैक्टर सब्सिडी योजना के तहत अनुदान राशि में बड़ा इजाफा किया है। अब पात्र किसानों को मिनी ट्रैक्टर खरीदने पर 2.25 लाख रुपये तक की सब्सिडी दी जा रही है। इस कदम का सीधा फायदा उन किसानों को मिलेगा, जिनके पास कम जमीन है और जो अब तक ट्रैक्टर की ऊंची कीमतों के कारण आधुनिक खेती से दूर थे।

    आज के दौर में खेती को उन्नत और लाभकारी बनाने में ट्रैक्टर की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। जुताई, बुवाई, निराई-गुड़ाई, थ्रेसिंग और ढुलाई जैसे तमाम काम ट्रैक्टर की मदद से कम समय और कम मेहनत में पूरे हो जाते हैं। ट्रैक्टर के कारण किसान समय पर खेत की तैयारी कर पाते हैं, जिससे फसल की बुवाई में देरी नहीं होती और उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है। यही वजह है कि ट्रैक्टर को आधुनिक कृषि की रीढ़ कहा जाता है।

    हालांकि, महंगाई के इस दौर में ट्रैक्टर खरीदना हर किसान के लिए आसान नहीं रह गया है। खासतौर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जिनके पास 5 एकड़ से कम भूमि है, उनके लिए ट्रैक्टर खरीदना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसे किसान अक्सर बड़े किसानों या किराये के ट्रैक्टर पर निर्भर रहते हैं। इससे न केवल खेती की लागत बढ़ जाती है, बल्कि समय पर काम न हो पाने से फसल पर भी असर पड़ता है। कई बार बुवाई या जुताई में देरी होने से उत्पादन कम हो जाता है और किसान की आमदनी पर सीधा असर पड़ता है।

    इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मिनी ट्रैक्टर सब्सिडी योजना को और प्रभावी बनाने का फैसला लिया है। पहले इस योजना के तहत किसानों को 1 लाख रुपये तक का अनुदान मिलता था, लेकिन अब बढ़ती महंगाई और ट्रैक्टर की कीमतों को देखते हुए सरकार ने इसे बढ़ाकर अधिकतम 2.25 लाख रुपये कर दिया है। यह फैसला खास तौर पर छोटे किसानों के लिए राहत लेकर आया है, जो लंबे समय से इस तरह की मदद का इंतजार कर रहे थे।

    यह योजना हॉर्टिकल्चर (उद्यानिकी) विभाग द्वारा संचालित की जा रही है। योजना का लाभ उठाने के लिए किसानों को विभाग के आधिकारिक पोर्टल MPFST पर ऑनलाइन पंजीकरण करना होता है। रजिस्ट्रेशन के बाद किसान योजना में शामिल 10 से 12 मान्यता प्राप्त ट्रैक्टर कंपनियों में से किसी एक कंपनी का चयन कर सकते हैं। इससे किसानों को गुणवत्ता वाले ट्रैक्टर खरीदने का अवसर मिलता है और उन्हें किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।

    इस योजना के तहत किसानों का चयन लॉटरी सिस्टम के जरिए किया जाता है। यानी सभी आवेदकों में से पारदर्शी तरीके से लाभार्थियों का चयन किया जाता है। अगर किसी किसान का नाम लॉटरी में आ जाता है, तो उसे पहले ट्रैक्टर की कुल कीमत का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा स्वयं भुगतान करना होता है। इसके बाद ट्रैक्टर खरीद की प्रक्रिया पूरी की जाती है। शेष सब्सिडी राशि सरकार द्वारा डीबीटी (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से सीधे किसान के बैंक खाते में भेज दी जाती है। इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होती है और पैसा सीधे लाभार्थी तक पहुंचता है।

    सरकार ने इस योजना में खासतौर पर 20 हॉर्स पावर (HP) तक के मिनी ट्रैक्टर पर फोकस किया है। वर्तमान समय में 20 HP का मिनी ट्रैक्टर बाजार में लगभग 4.5 लाख रुपये की कीमत में उपलब्ध है। ट्रैक्टर की कीमतों में लगातार हो रहे इजाफे को देखते हुए सरकार ने सब्सिडी राशि बढ़ाने का फैसला लिया है, ताकि किसानों पर आर्थिक बोझ कम हो सके और वे आसानी से ट्रैक्टर खरीद सकें।

    भूमि के आधार पर सब्सिडी की राशि भी तय की गई है। जिन किसानों के पास 5 एकड़ से अधिक भूमि है, उन्हें ट्रैक्टर पर लगभग 80 हजार रुपये तक की सब्सिडी मिल सकती है। वहीं, 5 एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को मिनी ट्रैक्टर पर अधिकतम 2.25 लाख रुपये तक का अनुदान दिया जाएगा। इससे छोटे और सीमांत किसानों को सबसे ज्यादा फायदा होने की उम्मीद है।

    इस योजना के तहत पात्रता से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण शर्तें भी रखी गई हैं। कोई भी किसान इस योजना का लाभ ले सकता है, लेकिन शर्त यह है कि उसने पिछले 7 वर्षों में ट्रैक्टर या पावर टिलर खरीदने पर किसी भी सरकारी योजना के तहत सब्सिडी का लाभ न लिया हो। इसके अलावा किसान केवल ट्रैक्टर या पावर टिलर में से किसी एक पर ही अनुदान प्राप्त कर सकता है। यानी अगर किसी किसान ने पहले पावर टिलर पर सब्सिडी ली है, तो वह इस योजना के तहत ट्रैक्टर पर अनुदान का लाभ नहीं ले सकेगा।

    आवेदन प्रक्रिया के दौरान किसानों को कुछ जरूरी दस्तावेज भी अपलोड करने होते हैं। इनमें आधार कार्ड, बैंक पासबुक के पहले पृष्ठ की कॉपी, बी-1 की प्रति, और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के किसानों के लिए जाति प्रमाण पत्र शामिल है। सिंचाई उपकरणों से जुड़े मामलों में बिजली कनेक्शन का प्रमाण भी मांगा जा सकता है। आवेदन के बाद जिला अधिकारी द्वारा ऑनलाइन सत्यापन किया जाता है और पात्र पाए जाने पर क्रय स्वीकृति आदेश जारी किया जाता है।

    इस योजना से किसानों को कई स्तरों पर फायदा मिलने वाला है। एक ओर जहां किराये के ट्रैक्टर पर निर्भरता कम होगी, वहीं दूसरी ओर किसान समय पर खेती के सभी काम खुद कर सकेंगे। इससे खेती की लागत घटेगी, उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आमदनी में भी सुधार होगा। साथ ही, आधुनिक कृषि यंत्र अपनाने से किसान आत्मनिर्भर बनेंगे और खेती को व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ा सकेंगे।

    कुल मिलाकर, मिनी ट्रैक्टर पर 2.25 लाख रुपये तक की सब्सिडी देने का सरकार का यह फैसला छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक बड़ा सहारा साबित हो सकता है। अगर आप भी इस श्रेणी में आते हैं और ट्रैक्टर खरीदने की सोच रहे हैं, तो यह योजना आपके लिए सुनहरा मौका है। सही जानकारी, समय पर आवेदन और पात्रता शर्तों को पूरा करके आप इस योजना का लाभ उठा सकते हैं और अपनी खेती को नई दिशा दे सकते हैं।

  • राष्ट्रीय पशुधन मिशन 2025: भेड़ पालन पर 50% सब्सिडी, 50 लाख तक अनुदान

    राष्ट्रीय पशुधन मिशन 2025: भेड़ पालन पर 50% सब्सिडी, 50 लाख तक अनुदान

    राष्ट्रीय पशुधन मिशन: भेड़ पालन पर 50% तक सब्सिडी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत


    भारत सरकार ग्रामीण भारत में रोजगार, आय और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) के तहत भेड़ पालन और बकरी पालन को बड़े स्तर पर प्रोत्साहित कर रही है। यह पहल खासतौर पर किसानों, पशुपालकों, ग्रामीण युवाओं और उद्यमियों के लिए एक सुनहरा अवसर बनकर उभरी है, जहां कम निवेश में टिकाऊ और लाभकारी व्यवसाय शुरू किया जा सकता है। सरकार द्वारा दी जा रही 50 प्रतिशत तक की पूंजीगत सब्सिडी ने इस क्षेत्र में नई उम्मीदें जगा दी हैं और देशभर में इसे लेकर सकारात्मक माहौल बन रहा है।

    राष्ट्रीय पशुधन मिशन का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देना, पशुधन की उत्पादकता में सुधार करना और किसानों की आय में स्थायी वृद्धि सुनिश्चित करना है। इसी दिशा में केंद्र सरकार के मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) भेड़ और बकरी पालन को विशेष प्राथमिकता दे रहा है। योजना के तहत बड़े पैमाने पर व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से भेड़ पालन इकाइयों की स्थापना को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, राष्ट्रीय पशुधन मिशन के उद्यमिता विकास कार्यक्रम (EDP) के अंतर्गत 500 भेड़ या बकरियों की क्षमता वाली इकाइयों के लिए परियोजना लागत का 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है, जिसकी अधिकतम सीमा 50 लाख रुपये तय की गई है। यह सब्सिडी सीधे उन लाभार्थियों को उपलब्ध कराई जाती है, जो योजना के मानकों के अनुसार परियोजना रिपोर्ट तैयार कर उसे सफलतापूर्वक लागू करते हैं। इस आर्थिक सहायता से ग्रामीण क्षेत्रों में भेड़ पालन व्यवसाय को संगठित रूप देने में मदद मिल रही है।

    भेड़ और बकरी पालन को लंबे समय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार माना जाता रहा है। इसे अक्सर “गरीबों का एटीएम” भी कहा जाता है, क्योंकि यह सीमांत और छोटे किसानों के लिए नियमित और भरोसेमंद आय का साधन है। खास बात यह है कि भेड़ पालन को कम पूंजी में शुरू किया जा सकता है और यह सूखा प्रभावित, पहाड़ी या कम संसाधन वाले क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है। यही कारण है कि सरकार इसे ग्रामीण आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्तंभ मान रही है।

    राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत केवल वित्तीय सहायता ही नहीं, बल्कि नस्ल सुधार और उत्पादकता बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य बेहतर और उन्नत नस्लों के माध्यम से मटन और ऊन उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि करना है। आनुवंशिक सुधार कार्यक्रमों के जरिए भेड़ों की उत्पादकता, वृद्धि दर और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाया जा रहा है। इससे न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि पशुपालकों की लागत भी कम होती है और मुनाफा बढ़ता है, जिससे किसानों की आय में दीर्घकालिक सुधार संभव हो पाता है।

    इसके साथ ही सरकार पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) के माध्यम से भी भेड़ पालन से जुड़ी गतिविधियों को मजबूती दे रही है। इस योजना के अंतर्गत अपशिष्ट से धन सृजन, वैक्सीन निर्माण इकाइयों, प्राथमिक ऊन प्रसंस्करण इकाइयों और अन्य संबंधित परियोजनाओं के लिए 3 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है। यह पहल पशुपालन से जुड़ी पूरी मूल्य शृंखला (Value Chain) को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभा रही है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में नए उद्योग और रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं।

    सरकार का मानना है कि यदि भेड़ पालन को केवल कच्चे उत्पादन तक सीमित न रखकर प्रसंस्करण, विपणन और मूल्य संवर्धन से जोड़ा जाए, तो किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिल सकता है। इसी उद्देश्य से एक एकीकृत मूल्य शृंखला विकसित करने पर काम किया जा रहा है, ताकि बिचौलियों की भूमिका कम हो और लाभ सीधे पशुपालकों तक पहुंचे। इससे ग्रामीण आय में वृद्धि के साथ-साथ देश में मटन और ऊन क्षेत्र की अप्रयुक्त क्षमता का बेहतर उपयोग संभव हो सकेगा।

    भेड़ पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार कौशल विकास और क्षमता निर्माण पर भी खास ध्यान दे रही है। किसानों और उद्यमियों को आधुनिक पशुपालन तकनीकों, पशु स्वास्थ्य प्रबंधन, पोषण, प्रजनन और विपणन से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन पद्धतियां ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच सकें। मोबाइल पशु चिकित्सा वैन के जरिए टीकाकरण, कृत्रिम गर्भाधान और पशु स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाई जा रही है, जिससे पशुओं की उत्पादकता और स्वास्थ्य दोनों में सुधार हो रहा है।

    सरकार की यह पहल ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए भी नए अवसर खोल रही है। भेड़ पालन न केवल स्वरोजगार का साधन बन रहा है, बल्कि ग्रामीण उद्यमिता को भी बढ़ावा दे रहा है। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को बल मिल रहा है। वहीं युवा वर्ग इसे एक आधुनिक और लाभकारी व्यवसाय के रूप में अपनाकर गांवों में ही रोजगार सृजन कर रहा है।

    कुल मिलाकर, राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत भेड़ और बकरी पालन को दिया जा रहा प्रोत्साहन ग्रामीण भारत के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो रहा है। 50 लाख रुपये तक की सब्सिडी, ब्याज सहायता, नस्ल सुधार, अवसंरचना विकास और कौशल प्रशिक्षण जैसे कदम इस क्षेत्र को व्यावसायिक रूप से मजबूत बना रहे हैं। यदि किसान, पशुपालक और उद्यमी इस योजना का सही तरीके से लाभ उठाएं, तो भेड़ पालन न केवल उनकी आय बढ़ा सकता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा और मजबूती भी दे सकता है

  • PM Awas Yojana Gramin: डोर-टू-डोर जांच शुरू, अपात्रों के नाम कटेंगे

    PM Awas Yojana Gramin: डोर-टू-डोर जांच शुरू, अपात्रों के नाम कटेंगे

    डोर-टू-डोर सर्वे के लिए गठित हुई जांच कमेटी, जल्द पूरा किया जाएगा सर्वे कार्य


    प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत वास्तविक जरूरतमंद परिवारों तक पक्का मकान पहुंचाने के उद्देश्य से बिहार के रोहतास जिले के डेहरी प्रखंड में प्रशासन ने सख्त और पारदर्शी कदम उठाए हैं। आवास प्लस-2024 के अंतर्गत किए गए सर्वे के बाद अब भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है, जिसके लिए विशेष जांच कमेटियों का गठन किया गया है। यह जांच पूरी तरह डोर-टू-डोर सर्वे के माध्यम से होगी, ताकि कोई भी अपात्र व्यक्ति योजना का अनुचित लाभ न ले सके और सही पात्र परिवारों को उनका हक मिल सके।

    प्रशासन का स्पष्ट उद्देश्य है कि प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का लाभ केवल उन्हीं परिवारों तक पहुंचे, जो वास्तव में बेघर हैं या कच्चे मकानों में जीवन यापन कर रहे हैं। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए डेहरी प्रखंड क्षेत्र की सभी पंचायतों में घर-घर जाकर सत्यापन कराया जाएगा। इस दौरान लाभुकों के दस्तावेज, वर्तमान आवास की स्थिति, आय के स्रोत, संपत्ति और अन्य निर्धारित मानकों की गहन जांच की जाएगी। यदि कोई परिवार पात्रता की शर्तों पर खरा नहीं उतरता है, तो उसका नाम आवास प्लस-2024 की सूची से हटाया जाएगा।

    डेहरी प्रखंड में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत आवास प्लस-2024 के लिए पहले ही व्यापक सर्वे कराया जा चुका है। इस सर्वे में दो तरीकों से डेटा एकत्र किया गया। एक ओर सर्वेयरों ने पंचायतों में घर-घर जाकर जानकारी जुटाई, वहीं दूसरी ओर कई परिवारों ने मोबाइल ऐप के माध्यम से सेल्फ सर्वे भी पूरा किया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लगभग 6850 परिवारों का सर्वे सर्वेयरों द्वारा किया गया, जबकि 2548 परिवारों ने मोबाइल ऐप से स्वयं सर्वे किया। यह पूरा डेटा आवास प्लस ऐप 2024 पर अपलोड किया गया है, जिसके आधार पर अब भौतिक सत्यापन की कार्रवाई की जा रही है।

    इस सत्यापन प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए प्रशासन ने तीन स्तरों पर जांच प्रणाली लागू की है। पंचायत स्तर पर गठित टीम घर-घर जाकर जांच करेगी और अपनी रिपोर्ट प्रखंड कार्यालय को सौंपेगी। खास बात यह है कि जिस कर्मी ने सर्वे किया है, वही उस पंचायत में सत्यापन नहीं करेगा, ताकि किसी भी प्रकार की पक्षपात या अनियमितता की गुंजाइश न रहे। प्रखंड स्तर पर बीडीओ की अध्यक्षता में गठित समिति पंचायत से प्राप्त सूचियों का कम से कम 10 प्रतिशत डेटा स्वयं जाकर सत्यापित करेगी। वहीं जिला स्तर पर डीडीसी की अध्यक्षता में गठित टीम प्रखंडों से आई रिपोर्ट का 2 प्रतिशत रैंडम सत्यापन करेगी। इस बहुस्तरीय व्यवस्था से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि पूरी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और विश्वसनीय रहे।

    प्रखंड विकास पदाधिकारी अजीत कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत किसी भी अपात्र व्यक्ति को लाभ नहीं दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि सत्यापन पूरी तरह विभागीय गाइडलाइन के अनुसार होगा और किसी भी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रशासन का सख्त संदेश है कि योजना का लाभ केवल वास्तविक और पात्र जरूरतमंदों को ही मिलेगा।

    इस बार आवास प्लस-2024 सर्वे का एक बड़ा उद्देश्य उन परिवारों को भी शामिल करना है, जो पिछले सर्वे में छूट गए थे। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत अंतिम बड़ा सर्वे वर्ष 2018-19 में कराया गया था। उसी समय तैयार की गई प्रतीक्षा सूची के आधार पर पिछले कई वर्षों से आवास स्वीकृत किए जाते रहे। लेकिन बीते छह वर्षों में कई नए परिवार बने, कई परिवार अलग हुए और कई जरूरतमंद लोग सूची से बाहर रह गए। ऐसे में छह साल बाद दोबारा सर्वे कराकर वास्तविक जरूरतमंदों को योजना में शामिल करने की पहल की गई है।

    आवास प्लस-2024 के तहत हो रहे इस नए सर्वे और सत्यापन से ग्रामीण इलाकों के गरीब परिवारों को बड़ी उम्मीद जगी है। प्रशासन का मानना है कि इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद एक नई और अपडेटेड प्रतीक्षा सूची तैयार की जाएगी, जिसके आधार पर आने वाले समय में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत पक्के मकानों की स्वीकृति दी जाएगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जिनके पास आज भी सिर छुपाने के लिए पक्का मकान नहीं है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर लाभ मिल सके।

    प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) की पात्रता शर्तों को लेकर भी प्रशासन पूरी तरह स्पष्ट है। योजना के तहत वही परिवार पात्र माने जाएंगे, जिनके पास रहने योग्य पक्का मकान नहीं है, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिन्होंने पहले किसी भी सरकारी आवास योजना का लाभ नहीं लिया है। इसके अलावा जिन परिवारों के पास मोटर वाहन, ट्रैक्टर या महंगी मशीनरी नहीं है, उन्हें भी पात्र श्रेणी में रखा गया है। वहीं दूसरी ओर जिनके पास पहले से पक्का मकान है, जिनकी मासिक आय 15,000 रुपये से अधिक है, जिनके परिवार में कोई सरकारी नौकरी करता है, जो आयकर या व्यवसाय कर देते हैं, या जिनके पास 2.5 एकड़ से अधिक सिंचित या 5 एकड़ से अधिक असिंचित भूमि है, उन्हें योजना के लिए अपात्र माना जाएगा।

    सत्यापन के दौरान इन सभी मानकों की जांच दस्तावेजों के साथ-साथ पड़ोसियों से प्राप्त जानकारी और विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर की जाएगी। प्रशासन का कहना है कि यह प्रक्रिया केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जमीनी हकीकत को परखा जाएगा। यदि किसी स्तर पर गलत जानकारी देने या फर्जी तरीके से लाभ लेने की कोशिश सामने आती है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।

    कुल मिलाकर, डेहरी प्रखंड में शुरू की गई यह डोर-टू-डोर जांच प्रक्रिया प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है। पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही के साथ किए जा रहे इस सत्यापन से यह उम्मीद की जा रही है कि योजना का असली उद्देश्य पूरा होगा और ग्रामीण क्षेत्रों के वास्तविक जरूरतमंद परिवारों को सम्मानजनक पक्का आवास मिल सकेगा।

  • कृषक मित्र सूर्य योजना 2025: 90% सब्सिडी पर 7.5 HP सोलर पंप, आवेदन प्रक्रिया और पात्रता जानें

    कृषक मित्र सूर्य योजना 2025: 90% सब्सिडी पर 7.5 HP सोलर पंप, आवेदन प्रक्रिया और पात्रता जानें

    भोपाल: कृषक मित्र सूर्य योजना से किसानों को बड़ी राहत, 90% सब्सिडी पर मिलेगा 7.5 HP तक का सोलर पंप, जानें पूरी प्रक्रिया


    मध्यप्रदेश के किसानों के लिए सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को सस्ता, भरोसेमंद और बिजली कटौती से मुक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। राज्य में प्रधानमंत्री कृषक मित्र सूर्य योजना को तेजी से लागू किया जा रहा है, जिसके तहत पात्र किसानों को सोलर पंप लगाने पर 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जा रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को महंगे बिजली बिल, अस्थायी बिजली कनेक्शन और बार-बार होने वाली बिजली आपूर्ति की समस्या से निजात दिलाना है, ताकि खेती की लागत घटे और उत्पादन बढ़े।

    सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत किसान अपनी खेती और सिंचाई जरूरत के अनुसार 2 HP से लेकर 10 HP तक के सोलर पंप लगवा सकते हैं। खास बात यह है कि जिन किसानों के पास पहले से अस्थायी बिजली कनेक्शन है, उन्हें अधिक क्षमता वाला सोलर पंप चुनने का विकल्प भी दिया गया है। इससे किसानों को कम समय में अधिक सिंचाई करने में मदद मिलेगी और फसलों की उत्पादकता में सुधार होगा।

    वर्तमान में योजना के तहत नए आवेदन केवल उन्हीं किसानों से स्वीकार किए जा रहे हैं, जिन्होंने वर्ष 2023-24 और 2024-25 में अस्थायी विद्युत कनेक्शन लिया है। सरकार द्वारा यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि पहले से बिजली पर निर्भर किसानों को सौर ऊर्जा की ओर स्थानांतरित किया जा सके और बिजली वितरण प्रणाली पर भार कम किया जा सके।

    योजना के अंतर्गत सोलर पंप की स्थापना के लिए किसानों को कुल लागत का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही वहन करना होगा। शेष 50 प्रतिशत अनुदान केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत अनुदान राज्य सरकार द्वारा दिया जा रहा है। यानी अगर किसी सोलर पंप की कुल कीमत लगभग 2 लाख रुपये है, तो किसान को अपनी जेब से केवल करीब 15 हजार रुपये खर्च करने होंगे, जबकि बाकी राशि सरकार सब्सिडी के रूप में देगी। यही वजह है कि यह योजना छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी बेहद लाभकारी साबित हो रही है।

    सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे सोलर पंप के साथ पैनल, मोटर, पाइप, कंट्रोलर और अन्य जरूरी उपकरण भी शामिल हैं, जिससे किसान को अलग से किसी व्यवस्था की चिंता नहीं करनी पड़ती। सौर ऊर्जा से चलने वाले ये पंप पर्यावरण के अनुकूल हैं और लंबे समय तक बिना अतिरिक्त खर्च के काम करते हैं। इससे न सिर्फ किसानों की सिंचाई लागत कम होगी, बल्कि डीजल और बिजली पर निर्भरता भी लगभग खत्म हो जाएगी।

    योजना में एक महत्वपूर्ण सुविधा यह भी दी गई है कि जिन किसानों के पास 3 HP का अस्थायी बिजली कनेक्शन है, वे 5 HP सोलर पंप का चयन कर सकते हैं। वहीं, 5 HP कनेक्शनधारी किसान 7.5 HP सोलर पंप लगाने का विकल्प चुन सकते हैं। अधिक क्षमता वाले पंप के चयन पर किसानों को तय किया गया हितग्राही अंश जमा करना होगा, जिसकी जानकारी पोर्टल पर स्पष्ट रूप से उपलब्ध है। इससे किसान अपनी जमीन, फसल और पानी की जरूरत के अनुसार सही क्षमता का पंप चुन सकते हैं।

    नए आवेदकों के लिए भी सरकार ने सुविधा दी है कि वे ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन करते समय एक से अधिक क्षमता वाले सोलर पंप के विकल्प देख सकते हैं। इससे किसान अपनी सिंचाई आवश्यकता, भूमि का रकबा और जल स्रोत की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय ले सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह लचीलापन योजना को और अधिक व्यावहारिक बनाता है।

    आवेदन प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन और पारदर्शी रखा गया है। किसानों को आवेदन के दौरान अपनी आधार ई-केवाईसी, पंप श्रेणी, कनेक्शन आईडी और इकाई चयन से जुड़ी जानकारी पोर्टल पर दर्ज करनी होती है। इन सभी विवरणों का सत्यापन होने के बाद ही सोलर पंप स्थापना की आगे की प्रक्रिया शुरू की जाती है। इससे फर्जीवाड़े की संभावना कम होती है और वास्तविक जरूरतमंद किसानों तक योजना का लाभ पहुंचता है।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि योजना के अंतर्गत 31 दिसंबर 2025 तक कार्यादेश जारी किए जाने हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए किसानों से अपील की गई है कि वे समय-सीमा के भीतर अपना हितग्राही अंश जमा कर दें, ताकि सोलर पंप की स्थापना में किसी तरह की देरी न हो। समय पर राशि जमा करने से किसान जल्द ही सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई सुविधा का लाभ उठा सकेंगे।

    लागत की बात करें तो सब्सिडी के बाद किसानों को अलग-अलग क्षमता के सोलर पंप के लिए अनुमानित रूप से यह राशि चुकानी होगी—2 HP पंप के लिए करीब 15 हजार रुपये, 3 HP के लिए लगभग 20 हजार रुपये, 5 HP के लिए करीब 30 हजार रुपये, 7.5 HP के लिए लगभग 41 हजार रुपये और 10 HP सोलर पंप के लिए करीब 58 हजार रुपये। यह राशि पारंपरिक पंपों की तुलना में काफी कम है और लंबे समय में किसानों को बड़ा आर्थिक लाभ देती है।

    योजना का लाभ वही किसान उठा सकते हैं, जिनके पास खेती योग्य भूमि पर स्थायी जल स्रोत उपलब्ध है। इसके अलावा जिन किसानों के पास अस्थायी बिजली कनेक्शन है या जिनके पास बिजली कनेक्शन नहीं है, वे भी पात्रता शर्तों को पूरा करने पर आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के लिए किसानों को cmsolarpump.mp.gov.in पोर्टल पर जाना होगा, जहां पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से समझाई गई है।

    कुल मिलाकर, कृषक मित्र सूर्य योजना मध्यप्रदेश के किसानों के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। यह योजना न केवल सिंचाई की लागत को कम करेगी, बल्कि किसानों को स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने में भी मदद करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इस योजना से खेती की तस्वीर बदलेगी और किसान बिजली की समस्याओं से मुक्त होकर उत्पादन पर पूरा ध्यान दे सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए किसान अपने जिले के कृषि विभाग या बिजली विभाग के अधिकारियों से भी संपर्क कर सकते हैं।

  • PM Awas Yojana 2025: 23 दिसंबर को 18,500 लोगों के खाते में आएंगे ₹100 करोड़, अभी चेक करें लिस्ट

    PM Awas Yojana 2025: 23 दिसंबर को 18,500 लोगों के खाते में आएंगे ₹100 करोड़, अभी चेक करें लिस्ट

    पीएम आवास योजना: 18,500 लाभार्थियों के खातों में 100 करोड़ रुपये भेजेगी सरकार, 23 दिसंबर को DBT से ट्रांसफर

    PM Awas Yojana 2025: 23 दिसंबर को 18,500 लोगों के खाते में आएंगे ₹100 करोड़, अभी चेक करें लिस्ट


    राजस्थान के ग्रामीण परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) से जुड़ी एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। लंबे समय से पक्के घर का इंतजार कर रहे हजारों लाभार्थियों के लिए अब खुश होने का मौका है। राज्य सरकार ने योजना के तहत पात्र लोगों के बैंक खातों में सीधे राशि ट्रांसफर करने की पूरी तैयारी कर ली है। इस प्रक्रिया के तहत 18,500 लाभार्थियों के खातों में कुल 100 करोड़ रुपये की राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से भेजी जाएगी।

    सरकारी अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, यह राशि 23 दिसंबर तक लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंच सकती है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब और जरूरतमंद परिवारों को घर बनाने में किसी भी प्रकार की आर्थिक परेशानी न हो। पीएम आवास योजना ग्रामीण के अंतर्गत मिलने वाली यह सहायता राशि आवास निर्माण की गति को और तेज करेगी, जिससे ज्यादा से ज्यादा परिवारों को समय पर पक्का मकान मिल सके।

    राजस्थान में PM Awas Yojana Gramin के तहत अब तक उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। राज्य सरकार ने ग्रामीण इलाकों में बेघर और कच्चे मकानों में रहने वाले परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराने के लिए बड़े पैमाने पर काम किया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में योजना के अंतर्गत लगभग 24,97,121 आवासों का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इनमें से अब तक करीब 24,35,942 लाभार्थियों ने अपना पंजीकरण पूरा कर लिया है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि योजना को ग्रामीण क्षेत्रों में जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है।

    सरकार की ओर से पंजीकृत आवेदनों में से लगभग 24,33,490 आवासों को आधिकारिक स्वीकृति दी जा चुकी है। यही नहीं, 11 दिसंबर तक 18,07,863 आवासों का निर्माण कार्य पूरा भी हो चुका है। ये आंकड़े साफ तौर पर दर्शाते हैं कि प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण राजस्थान में तेजी से आगे बढ़ रही है और लाखों परिवारों को इसका सीधा लाभ मिल चुका है।

    योजना के तहत अगली किस्त जारी करने के लिए राज्य सरकार ने नागौर जिले के मेड़ता में एक बड़े किसान सम्मेलन का आयोजन किया है। इसी कार्यक्रम के दौरान राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा 23 दिसंबर को दोपहर करीब 1 बजे रिमोट का बटन दबाकर योजना की राशि लाभार्थियों के खातों में ट्रांसफर करेंगे। यह पूरी प्रक्रिया DBT प्रणाली के जरिए होगी, जिससे धनराशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचेगी और किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी।

    सरकार का मानना है कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से पारदर्शिता बनी रहती है और लाभार्थियों को समय पर पूरा लाभ मिलता है। यही वजह है कि पीएम आवास योजना समेत अधिकतर सरकारी योजनाओं में DBT को प्राथमिकता दी जा रही है।

    अगर आपने भी PMAY-G के तहत आवेदन किया है और यह जानना चाहते हैं कि आपके खाते में पैसा आया है या नहीं, तो इसके लिए आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। आप घर बैठे ही अपने मोबाइल या कंप्यूटर के जरिए इसकी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले आपको योजना की आधिकारिक वेबसाइट dord.gov.in पर जाना होगा। वेबसाइट के होमपेज पर मौजूद Stakeholders टैब पर क्लिक करना होगा। इसके बाद PMAYG Beneficiary विकल्प को चुनना है। यहां आपको आवेदन के समय मिला रजिस्ट्रेशन नंबर और कैप्चा कोड दर्ज करना होगा। सारी जानकारी भरने के बाद जैसे ही आप सबमिट करेंगे, आपकी आवेदन स्थिति स्क्रीन पर दिखाई दे जाएगी। इससे आपको यह स्पष्ट हो जाएगा कि आप लाभार्थी सूची में हैं या नहीं और आपके खाते में राशि ट्रांसफर हुई है या नहीं।

    सरकार ने यह भी साफ किया है कि पीएम आवास योजना ग्रामीण के तहत लाभार्थियों का चयन एक तय प्रक्रिया और गाइडलाइन के आधार पर किया जाता है। योजना में कुछ वर्गों को प्राथमिकता दी गई है, ताकि सबसे ज्यादा जरूरतमंद लोगों को पहले लाभ मिल सके। इनमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और महिलाएं, विशेष रूप से वे परिवार जिनकी मुखिया महिला है, को प्राथमिकता दी जाती है। सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार कुल आवासों में से करीब 60 प्रतिशत आवास SC/ST वर्ग के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान है। इसी नीति के तहत योजना की किस्तें जारी की जाती हैं।

    कई बार ऐसा होता है कि तय तारीख पर कुछ लाभार्थियों के खाते में राशि नहीं पहुंच पाती। ऐसे में सरकार ने स्पष्ट किया है कि लाभार्थियों को घबराने की जरूरत नहीं है। संभव है कि उनका नाम वेटिंग लिस्ट में हो और अगली सूची में उन्हें भुगतान किया जाए। पीएम आवास योजना के तहत भुगतान की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से की जाती है। यानी सभी पात्र लाभार्थियों को अलग-अलग चरणों में राशि ट्रांसफर की जाती है। यदि 23 दिसंबर को आपके खाते में पैसा नहीं आता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको योजना का लाभ नहीं मिलेगा। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि पात्र सभी लाभार्थियों को समय रहते योजना की राशि उनके खातों में जरूर भेजी जाएगी।

    राजस्थान सरकार का मानना है कि प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण न केवल लोगों को पक्का घर उपलब्ध करा रही है, बल्कि उनके जीवन स्तर में भी बड़ा सुधार ला रही है। पक्का मकान मिलने से ग्रामीण परिवारों को सुरक्षा, सम्मान और बेहतर जीवन जीने का अवसर मिल रहा है। आने वाले समय में सरकार का लक्ष्य है कि कोई भी पात्र परिवार बिना पक्के घर के न रहे। इसी दिशा में लगातार नई किस्तें जारी की जा रही हैं और निर्माण कार्य को गति दी जा रही है।

    कुल मिलाकर, 23 दिसंबर का दिन राजस्थान के हजारों ग्रामीण परिवारों के लिए बेहद खास होने वाला है। 18,500 लाभार्थियों के खातों में 100 करोड़ रुपये की यह राशि उनके सपनों के घर को हकीकत में बदलने में अहम भूमिका निभाएगी। पीएम आवास योजना के जरिए सरकार का यह प्रयास साफ तौर पर दिखाता है कि ग्रामीण भारत को मजबूत बनाने और हर परिवार को सम्मानजनक आवास देने की दिशा में काम लगातार जारी है।

  • ग्रामीण रोजगार में बड़ा बदलाव: 125 दिन काम देगा विकसित भारत-जी राम जी विधेयक 2025

    ग्रामीण रोजगार में बड़ा बदलाव: 125 दिन काम देगा विकसित भारत-जी राम जी विधेयक 2025

    विकसित भारत–जी राम जी विधेयक 2025: ग्रामीण रोजगार और आजीविका को नई दिशा देने वाला ऐतिहासिक कदम


    ग्रामीण भारत की बदलती ज़रूरतों और विकसित भारत 2047 के दीर्घकालिक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025, जिसे विकसित भारत–जी राम जी विधेयक 2025 के नाम से भी जाना जा रहा है, को सामने रखा है। यह विधेयक अब तक ग्रामीण रोज़गार की रीढ़ रहे मनरेगा की जगह एक नया, अधिक आधुनिक और परिणामोन्मुख वैधानिक ढांचा प्रस्तुत करता है। सरकार का दावा है कि यह बदलाव केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण अवसंरचना, आय सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन और आजीविका सृजन को एक साथ मजबूत करेगा।

    करीब दो दशकों तक मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार देकर बड़ी भूमिका निभाई। इससे गांवों में आय का सहारा मिला, पलायन कम हुआ और कई बुनियादी परिसंपत्तियां बनीं। लेकिन समय के साथ ग्रामीण भारत की सामाजिक-आर्थिक तस्वीर बदल गई। डिजिटल कनेक्टिविटी, वित्तीय समावेशन, वैकल्पिक आजीविकाएं और घटती गरीबी ने यह संकेत दिया कि अब केवल मांग-आधारित रोजगार व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। इन्हीं परिस्थितियों में सरकार ने एक व्यापक कानूनी सुधार का रास्ता चुना।

    नए विधेयक के तहत प्रति ग्रामीण परिवार रोजगार की गारंटी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है। इसका सीधा लाभ यह होगा कि ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा और मजबूत होगी। खास बात यह है कि खेती के महत्वपूर्ण मौसम—बुवाई और कटाई—के दौरान 60 दिनों का नो-वर्क पीरियड तय किया गया है, ताकि खेतों में मजदूरों की उपलब्धता बनी रहे और कृषि उत्पादन प्रभावित न हो। शेष अवधि में भी परिवारों को साल भर में कुल 125 दिन का सुनिश्चित रोजगार मिलता रहेगा।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि मजदूरी का भुगतान हर सप्ताह या अधिकतम 15 दिनों के भीतर कर दिया जाएगा। डिजिटल भुगतान प्रणाली, आधार-आधारित सत्यापन और पारदर्शी एमआईएस से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मजदूरों को समय पर मेहनताना मिले और बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो।

    इस नए कानून की एक बड़ी खासियत यह है कि रोजगार को केवल अस्थायी मजदूरी तक सीमित न रखकर उसे टिकाऊ ग्रामीण विकास से जोड़ा गया है। इसके लिए चार प्राथमिक क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है—जल सुरक्षा से जुड़े कार्य, मुख्य ग्रामीण अवसंरचना जैसे सड़क और कनेक्टिविटी, आजीविका से संबंधित बुनियादी ढांचा जैसे भंडारण और बाजार सुविधाएं, तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने वाले कार्य। इन क्षेत्रों में होने वाला काम न सिर्फ रोजगार देगा, बल्कि लंबे समय तक गांवों की उत्पादक क्षमता भी बढ़ाएगा।

    सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक से जोड़ा जाएगा, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर योजनाओं का एकीकरण संभव होगा। योजना निर्माण का आधार विकसित ग्राम पंचायत योजनाएं होंगी, जिन्हें स्थानीय स्तर पर तैयार किया जाएगा और पीएम गति शक्ति जैसी राष्ट्रीय प्रणालियों से जोड़ा जाएगा। इससे विकेंद्रीकृत योजना निर्माण को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकास कार्य हो सकेंगे।

    विधेयक में वित्त पोषण की व्यवस्था को भी पूरी तरह नया रूप दिया गया है। अब यह योजना केंद्रीय क्षेत्र की बजाय केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में लागू होगी। इसके तहत सामान्य राज्यों के लिए 60:40, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10, और बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण का प्रावधान है। कुल अनुमानित वार्षिक खर्च लगभग 1.51 लाख करोड़ रुपये आंका गया है, जिसमें केंद्र का हिस्सा करीब 95,692 करोड़ रुपये होगा। सरकार का कहना है कि इससे राज्यों पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा, बल्कि पूर्वानुमेय और स्थिर बजट व्यवस्था बनेगी।

    नए मॉडल में डिमांड-आधारित फंडिंग की जगह नॉर्मेटिव फंडिंग लाई गई है। इसका मतलब है कि राज्यों को पहले से तय मानकों के आधार पर धन आवंटित होगा, जिससे अनिश्चितता खत्म होगी और बेहतर योजना बन सकेगी। इसके बावजूद रोजगार की कानूनी गारंटी और बेरोजगारी भत्ते का अधिकार बना रहेगा।

    संस्थागत ढांचे को भी अधिक स्पष्ट और मजबूत किया गया है। केंद्रीय और राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषदें नीति निर्धारण और निगरानी करेंगी। राष्ट्रीय और राज्य संचालन समितियां रणनीतिक दिशा और निष्पादन की समीक्षा करेंगी। पंचायती राज संस्थाएं, विशेष रूप से ग्राम पंचायतें, योजना निर्माण और कम से कम आधे कार्यान्वयन की जिम्मेदारी संभालेंगी। जिला कार्यक्रम समन्वयक, कार्यक्रम अधिकारी और ग्राम सभाएं मिलकर पारदर्शिता, सामाजिक लेखा-परीक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करेंगी।

    पारदर्शिता के मोर्चे पर भी बड़े बदलाव किए गए हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जीपीएस और मोबाइल-आधारित निगरानी, साप्ताहिक सार्वजनिक घोषणाएं और छह महीने में अनिवार्य सामाजिक लेखा-परीक्षा जैसे प्रावधान रखे गए हैं। केंद्र सरकार को यह अधिकार भी दिया गया है कि गंभीर अनियमितताओं की स्थिति में वह निधि जारी करने पर रोक लगा सके और सुधारात्मक कदम उठा सके।

    किसानों और मजदूरों—दोनों के लिए यह विधेयक लाभकारी माना जा रहा है। किसानों को खेती के मौसम में श्रमिकों की उपलब्धता, बेहतर सिंचाई, भंडारण और कनेक्टिविटी से फायदा मिलेगा। वहीं मजदूरों को अधिक काम के दिन, सुरक्षित डिजिटल भुगतान, अनुमानित रोजगार योजना और बेरोजगारी भत्ता जैसी सुविधाएं मिलेंगी। इससे ग्रामीण खपत बढ़ेगी, पलायन कम होगा और गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

    कुल मिलाकर, विकसित भारत–जी राम जी विधेयक 2025 को ग्रामीण रोजगार नीति में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। यह कानून मनरेगा के अनुभवों पर आधारित है, लेकिन उससे आगे बढ़कर आधुनिक शासन, जवाबदेही और अवसंरचना-केंद्रित विकास को प्राथमिकता देता है। अगर इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह न केवल रोजगार गारंटी का माध्यम बनेगा, बल्कि विकसित भारत 2047 के सपने को गांव-गांव तक पहुंचाने का मजबूत आधार भी तैयार करेगा।

  • महिला सशक्तिकरण की बड़ी पहल: यूपी में 28.92 लाख महिलाएं बनेंगी लखपति दीदी

    महिला सशक्तिकरण की बड़ी पहल: यूपी में 28.92 लाख महिलाएं बनेंगी लखपति दीदी

    यूपी सरकार 28.92 लाख महिलाओं को बनाएगी लखपति, तेजी से काम करने के निर्देश जारी

    महिला सशक्तिकरण की बड़ी पहल: यूपी में 28.92 लाख महिलाएं बनेंगी लखपति दीदी



    उत्तर प्रदेश सरकार ने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ‘लखपति दीदी’ कार्यक्रम के तहत वित्तीय वर्ष 2026-27 तक प्रदेश की 28.92 लाख महिलाओं को लखपति बनाने का लक्ष्य तय किया है। स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़ी महिलाओं की आमदनी को एक लाख रुपये या उससे अधिक तक पहुंचाने के इस अभियान को लेकर सरकार ने अधिकारियों को तेजी से काम करने और लक्ष्य समय पर पूरा करने के निर्देश जारी किए हैं। खास बात यह है कि चालू वित्तीय वर्ष में नवंबर तक ही 18.56 लाख महिलाएं इस श्रेणी में आ चुकी हैं, जबकि अगले वित्तीय वर्ष तक 10.36 लाख और महिलाओं को लखपति दीदी बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

    महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने वाला यह कार्यक्रम केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी पहल ‘लखपति दीदी योजना’ का हिस्सा है, जिसे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत लागू किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने देशभर में वर्ष 2026-27 तक दो करोड़ स्वयं सहायता समूह सदस्यों की वार्षिक आय एक लाख रुपये से अधिक करने का लक्ष्य रखा है। इसी राष्ट्रीय लक्ष्य में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 28.92 लाख महिलाओं की है, जिस पर राज्य सरकार मिशन मोड में काम कर रही है।

    प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों का नेटवर्क काफी व्यापक और मजबूत है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 8,96,618 स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जिनसे 98.49 लाख ग्रामीण परिवारों की महिलाएं जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएं गांव-गांव में विभिन्न आय सृजन गतिविधियों के जरिए न केवल अपने परिवार की आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रही हैं। कृषि आधारित कार्य, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, सिलाई-कढ़ाई, अगरबत्ती निर्माण, मशरूम उत्पादन और सेवा आधारित छोटे उद्यम जैसे कामों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

    सरकार के मुताबिक, लखपति दीदी कार्यक्रम के तहत प्रदेश में अब तक 35.94 लाख महिलाओं का चिन्हांकन किया जा चुका है। इनमें से 29.68 लाख महिलाओं का आय विवरण डिजिटल आजीविका रजिस्टर में दर्ज किया गया है। यह डिजिटल प्रणाली योजना की पारदर्शिता और निगरानी को मजबूत बनाती है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि वास्तविक लाभार्थियों तक योजना का लाभ पहुंचे। सरकार का स्पष्ट लक्ष्य है कि हर चयनित महिला की आय चार त्रैमासिक और फसल चक्र के दौरान लगातार तीन वर्षों तक एक लाख रुपये से कम न हो, ताकि आय केवल अस्थायी न रहे बल्कि स्थायी और टिकाऊ बने।

    महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए सरकार प्रशिक्षण और कौशल विकास पर भी विशेष ध्यान दे रही है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को उनके कार्य के अनुसार तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय साक्षरता, बैंकिंग से जुड़ाव और बाजार तक सीधी पहुंच उपलब्ध कराई जा रही है। कई जिलों में सफल लखपति दीदियों की सक्सेस स्टोरी को अन्य महिलाओं तक पहुंचाया जा रहा है, ताकि वे भी प्रेरित होकर स्वरोजगार अपनाएं और अपनी आय बढ़ा सकें। इससे गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।

    राज्य सरकार ने योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सभी जिलाधिकारियों और संबंधित विभागों को निर्देश दिए हैं कि वे नियमित रूप से योजना की समीक्षा करें। जिन जिलों में लक्ष्य की प्रगति धीमी है, वहां विशेष अभियान चलाकर महिलाओं को प्रशिक्षण, ऋण सुविधा और संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके साथ ही, बैंकिंग संस्थानों और स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से महिलाओं को आसान शर्तों पर ऋण और कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।

    लखपति दीदी योजना का उद्देश्य केवल आय बढ़ाना नहीं है, बल्कि महिलाओं को आर्थिक निर्णय लेने में सक्षम बनाना भी है। जब महिलाएं अपने दम पर कमाई करती हैं, तो परिवार और समाज में उनकी भूमिका और सम्मान दोनों बढ़ते हैं। सरकार का मानना है कि महिलाओं की आर्थिक मजबूती से बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण स्तर में भी सुधार होगा, जिसका सीधा असर प्रदेश के सामाजिक विकास पर पड़ेगा।

    ग्रामीण क्षेत्रों में यह योजना गरीबी उन्मूलन और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती देती है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं सामूहिक रूप से काम कर रही हैं, जिससे उत्पादन लागत कम होती है और मुनाफा बढ़ता है। कई जगह महिलाएं स्थानीय बाजारों के साथ-साथ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से भी जुड़ रही हैं, जिससे उनके उत्पादों को बेहतर कीमत मिल रही है।

    उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि आने वाले समय में लखपति दीदी कार्यक्रम को और प्रभावी बनाया जाएगा। इसके लिए नए-नए आय के साधनों को योजना से जोड़ा जाएगा और तकनीक का अधिकतम उपयोग किया जाएगा। डिजिटल भुगतान, ई-मार्केटिंग और आधुनिक प्रशिक्षण के जरिए महिलाओं को भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है। सरकार का फोकस इस बात पर है कि महिलाएं केवल लाभार्थी न बनें, बल्कि आर्थिक विकास की भागीदार बनें।

    कुल मिलाकर, लखपति दीदी योजना उत्तर प्रदेश में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक मजबूत और दूरगामी पहल साबित हो रही है। 28.92 लाख महिलाओं को लखपति बनाने का लक्ष्य न केवल उनकी जिंदगी बदलेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती देगा। तेजी से जारी निर्देश और लगातार निगरानी से यह साफ है कि सरकार इस योजना को लेकर गंभीर है और आने वाले वर्षों में इसके सकारात्मक परिणाम और अधिक देखने को मिल सकते हैं।

  • Central Bank का बड़ा ऐलान: ACE के साथ MoU, ट्रैक्टर और कृषि मशीनरी पर मिलेगा आसान लोन

    Central Bank का बड़ा ऐलान: ACE के साथ MoU, ट्रैक्टर और कृषि मशीनरी पर मिलेगा आसान लोन

    सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और ACE लिमिटेड की बड़ी पहल, ट्रैक्टर व कृषि मशीनरी के लिए आसान लोन से किसानों को मिलेगी नई ताकत

    Central Bank का बड़ा ऐलान: ACE के साथ MoU, ट्रैक्टर और कृषि मशीनरी पर मिलेगा आसान लोन



    नई दिल्ली से किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक खबर सामने आई है। देश के प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और अग्रणी कृषि व निर्माण उपकरण निर्माता एक्शन कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट (ACE) लिमिटेड के बीच एक अहम समझौता हुआ है। इस मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) का उद्देश्य किसानों, कृषि उद्यमियों और ग्रामीण ग्राहकों को ट्रैक्टर और कृषि मशीनरी के लिए संगठित, सस्ता और आसान वित्त उपलब्ध कराना है।

    यह साझेदारी ऐसे समय पर हुई है जब देश में कृषि यंत्रीकरण (Farm Mechanisation) की जरूरत तेजी से बढ़ रही है और छोटे व सीमांत किसान आधुनिक उपकरणों की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं। इस करार के जरिए दोनों संस्थान मिलकर ग्रामीण भारत में क्रेडिट पहुंच, उत्पादकता और आय में बढ़ोतरी को नई दिशा देने का प्रयास करेंगे।

    इस MoU पर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की ओर से डी. एस. राठौर, जनरल मैनेजर (ASBD) और ACE लिमिटेड की ओर से रविंद्र सिंह खनेजा, चीफ जनरल मैनेजर – एग्री डिवीजन ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर बैंक के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे, जिनमें एम. वी. मुरलीकृष्ण, कार्यकारी निदेशक, ई. रतन कुमार, कार्यकारी निदेशक, मुकुल डांडीगे, चीफ जनरल मैनेजर, वस्ती वेंकटेश, चीफ जनरल मैनेजर और पॉपी शर्मा, चीफ जनरल मैनेजर शामिल थे। वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति से यह स्पष्ट है कि यह करार बैंक और कृषि क्षेत्र दोनों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।

    इस समझौते का मूल फोकस किसानों को ट्रैक्टर लोन, फार्म इक्विपमेंट लोन, और अन्य आधुनिक कृषि मशीनों के लिए आसान शर्तों पर फाइनेंस उपलब्ध कराना है। अक्सर देखा गया है कि ग्रामीण इलाकों में किसानों को असंगठित स्रोतों से महंगे ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाती है। इस नई साझेदारी के तहत संगठित बैंकिंग प्रणाली के जरिए किसानों को भरोसेमंद और पारदर्शी वित्त मिलेगा, जिससे वे आधुनिक उपकरणों में निवेश कर सकेंगे।

    कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक ट्रैक्टर और कृषि मशीनरी न केवल खेती की लागत को नियंत्रित करती है बल्कि समय की भी बचत करती है। इससे बुआई, कटाई और सिंचाई जैसे कार्य अधिक कुशलता से पूरे होते हैं। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और ACE लिमिटेड का यह कदम खेती की उत्पादकता बढ़ाने, उपज में सुधार और किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य की दिशा में भी मददगार साबित हो सकता है।

    इस साझेदारी से छोटे और सीमांत किसानों को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है, जो अब तक पूंजी की कमी के कारण आधुनिक मशीनें नहीं खरीद पाते थे। इसके अलावा एग्री-एंटरप्रेन्योर, कस्टम हायरिंग सेंटर चलाने वाले किसान और ग्रामीण युवा भी इस योजना से लाभ उठा सकते हैं। इससे गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और कृषि से जुड़े सहायक व्यवसायों को भी मजबूती मिलेगी।

    ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव दूरगामी माना जा रहा है। जब किसानों को सही समय पर सस्ता कृषि ऋण मिलेगा, तो वे उत्पादन बढ़ा पाएंगे, जिससे बाजार में आपूर्ति सुधरेगी और आय में स्थिरता आएगी। इससे सस्टेनेबल फार्मिंग, बेहतर फसल प्रबंधन और पर्यावरण के अनुकूल खेती को भी बढ़ावा मिलेगा।

    सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की बात करें तो इसकी स्थापना वर्ष 1911 में हुई थी और यह देश के सबसे पुराने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में से एक है। बैंक की शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मजबूत मौजूदगी है। खास तौर पर कृषि और ग्रामीण वित्त में बैंक की भूमिका हमेशा अहम रही है। यह बैंक किसानों, स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों को कई प्रकार की वित्तीय सेवाएं प्रदान करता है, जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा मिलता है।

    वहीं ACE लिमिटेड भारत की जानी-मानी कंपनी है, जो ट्रैक्टर, कृषि उपकरण और निर्माण मशीनरी के क्षेत्र में मजबूत पहचान रखती है। कंपनी के उत्पाद देश के विभिन्न राज्यों में किसानों और ठेकेदारों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। बैंक और ACE का यह गठजोड़ वित्त और तकनीक को एक मंच पर लाकर किसानों को सीधा लाभ पहुंचाने की कोशिश है।

    इस पहल के साथ-साथ देश में डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म भी तेजी से उभर रहे हैं, जो किसानों को तेज और सरल प्रक्रिया के जरिए ट्रैक्टर और फार्म इक्विपमेंट लोन उपलब्ध करा रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में कृषि ऋण प्रणाली और अधिक पारदर्शी, तेज और किसान हितैषी बनने वाली है।

    कुल मिलाकर, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और ACE लिमिटेड के बीच हुआ यह MoU भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है। इससे न केवल किसानों को आधुनिक साधनों तक पहुंच मिलेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार और कृषि विकास को भी नई गति मिलेगी। यह साझेदारी आने वाले वर्षों में खेती को अधिक आधुनिक, लाभकारी और टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • फसल नुकसान मुआवजा: 22.90 लाख किसानों के खातों में ₹6,805 करोड़

    फसल नुकसान मुआवजा: 22.90 लाख किसानों के खातों में ₹6,805 करोड़

    बेमौसमी बारिश से तबाह फसलों के बाद किसानों को बड़ी राहत, 10 हजार करोड़ के पैकेज से अब तक 6,805 करोड़ सीधे खातों में पहुंचे

    फसल नुकसान मुआवजा: 22.90 लाख किसानों के खातों में ₹6,805 करोड़

    राज्य के किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। बेमौसमी बारिश से खरीफ फसलों को हुए भारी नुकसान के बाद सरकार ने जिस 10 हजार करोड़ रुपये के ऐतिहासिक राहत पैकेज का ऐलान किया था, उस पर तेजी से अमल शुरू हो चुका है। फसल सर्वे पूरा होने के बाद शुरू की गई इस फसल नुकसान मुआवजा प्रक्रिया के तहत अब तक 6,805 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि सीधे किसानों के बैंक खातों में ट्रांसफर की जा चुकी है। सरकार के इस कदम से लाखों किसान परिवारों को संबल मिला है, जिनकी फसलें अचानक हुई बारिश और मौसम की मार से बर्बाद हो गई थीं।

    इस साल मानसून के बाद बदले मौसम ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। कई जिलों में तेज और अनियोजित बारिश के कारण खड़ी फसलें गिर गईं, कटाई के लिए तैयार अनाज भीग गया और खेतों में पानी भरने से फसल उत्पादन पर गहरा असर पड़ा। खासतौर पर खरीफ सीजन की फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं, जिससे किसानों की आय पर सीधा संकट खड़ा हो गया। हालात को देखते हुए सरकार ने तुरंत फसल सर्वे कराने के निर्देश दिए, ताकि वास्तविक नुकसान का आकलन कर प्रभावित किसानों को समय पर मुआवजा दिया जा सके।

    फसल नुकसान आकलन के बाद सरकार ने राहत पोर्टल के जरिए आवेदन प्रक्रिया शुरू की। इस पोर्टल पर राज्य भर से करीब 33 लाख किसानों ने फसल नुकसान मुआवजे के लिए आवेदन किया। जांच के बाद अब तक 27 लाख से ज्यादा किसानों के आवेदन मंजूर हो चुके हैं। बीते 10 दिनों में 22.90 लाख किसानों के खातों में 6,805 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि जमा कराई जा चुकी है। सरकार ने साफ किया है कि शेष पात्र किसानों को भी जल्द ही मुआवजे की रकम ट्रांसफर की जाएगी।

    इस राहत पैकेज की सबसे अहम बात यह है कि मुआवजा दरों में बढ़ोतरी की गई है। पहले जहां प्रति हेक्टेयर 11 हजार रुपये की सहायता मिलती थी, वहीं अब इसे बढ़ाकर 22 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है। दो हेक्टेयर की सीमा के भीतर किसानों को अधिकतम 44 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है। इससे छोटे और सीमांत किसानों को सबसे ज्यादा लाभ मिला है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य के करीब 18 हजार गांवों में से 17 हजार गांवों के किसानों को इस राहत पैकेज का लाभ मिल चुका है। यह दिखाता है कि योजना की ग्राउंड लेवल पहुंच कितनी मजबूत है। वन और पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कि सरकार का लक्ष्य हर उस किसान तक मदद पहुंचाना है जो बेमौसमी बारिश से प्रभावित हुआ है।

    मुआवजे के साथ-साथ सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसलों की खरीद को प्राथमिकता दी है। इस वर्ष 15 हजार करोड़ रुपये तक MSP खरीद का लक्ष्य रखा गया है। इसमें मूंगफली, मूंग, उड़द और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलें शामिल हैं। अब तक 10.49 लाख टन खरीफ उपज की खरीद हो चुकी है, जिसकी कीमत करीब 7,537 करोड़ रुपये है। इससे 4.75 लाख किसानों को सीधा लाभ मिला है।

    दाल उत्पादक किसानों के लिए भी यह बड़ी राहत है। अब तक 2.18 लाख किसानों के खातों में 3,468 करोड़ रुपये MSP के तहत जमा कराए जा चुके हैं। इसके लिए 114 तालुकों में 317 खरीद केंद्र बनाए गए हैं। साथ ही सरकार ने ऐलान किया है कि 22 दिसंबर से अरहर (तुअर) की 100% खरीद MSP पर की जाएगी, जिससे किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से राहत मिलेगी।

    कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर मुआवजा भुगतान और MSP पर सरकारी खरीद किसानों के आत्मविश्वास को मजबूत कर रही है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से पारदर्शिता बढ़ी है और बिचौलियों की भूमिका लगभग खत्म हो गई है।

    कुल मिलाकर 10 हजार करोड़ का राहत पैकेज, फसल नुकसान मुआवजा, और MSP खरीद योजना बेमौसमी बारिश से प्रभावित किसानों के लिए संजीवनी साबित हो रही है। इससे किसानों को न सिर्फ तत्काल राहत मिल रही है, बल्कि भविष्य की खेती के लिए भी मजबूत आधार तैयार हो रहा है।