Iran-US War: पश्चिम एशिया में जारी ईरान-अमेरिका युद्ध की आग अब भारत के रसोई और बाजार तक पहुंच गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट और ईरान से आयात बाधित होने के कारण देश के प्रमुख फल और ड्राई फ्रूट बाजारों में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। पुणे के गुलटेकडी मार्केट यार्ड से लेकर दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों के थोक बाजारों तक हर जगह एक ही कहानी है। ईरानी सेब, कीवी, खजूर, पिस्ता और अन्य ड्राई फ्रूट या तो मिल नहीं रहे या फिर पहले से दोगुने दाम पर बिक रहे हैं। और इस संकट का एक और पहलू भी है जो किसानों को परेशान कर रहा है निर्यात बाधित होने से स्थानीय फलों की कीमतें गिर रही हैं।
Iran-US War: पुणे का गुलटेकडी मार्केट – जमीनी हाल
महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी पुणे का गुलटेकडी मार्केट यार्ड पश्चिम भारत के सबसे बड़े होलसेल फल और सब्जी केंद्रों में से एक है। यहां के व्यापारियों का कहना है कि एक हफ्ते से ज्यादा समय से ईरानी सेब की कोई नई खेप नहीं आई है। बाजार में काम करने वाले व्यापारी सुयोग जेंडे के अनुसार अभी सिर्फ वही विक्रेता ईरानी सेब बेच पा रहे हैं जिन्होंने युद्ध शुरू होने से पहले स्टॉक कर लिया था। जब यह स्टॉक खत्म हो जाएगा तो ईरानी सेब बाजार से पूरी तरह गायब हो सकते हैं।
Iran-US War: सेब की कीमत में 64% की उछाल
ईरानी सेब भारतीय बाजारों में अपनी मिठास, रंग और तुलनात्मक रूप से कम कीमत के कारण बेहद लोकप्रिय हैं। लेकिन अब हालात बदल गए हैं।
| सेब की किस्म | पहले की कीमत (₹/KG) | अब की कीमत (₹/KG) | बदलाव |
|---|---|---|---|
| ईरानी सेब | ₹110 | ₹180 | +64% |
| पोलैंड सेब | — | ₹200 | महंगा विकल्प |
| साउथ अफ्रीका सेब | — | ₹240 | और महंगा |
| न्यूजीलैंड सेब | — | ₹250+ | सबसे महंगा |
ईरानी सेब की सप्लाई रुकने के बाद व्यापारियों को साउथ अफ्रीका, पोलैंड और न्यूजीलैंड से सेब मंगाने पड़ रहे हैं। लेकिन ये विकल्प न सिर्फ महंगे हैं बल्कि आम उपभोक्ता की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं।
Iran-US War: कीवी – कीमत हुई दोगुनी
कीवी के मामले में स्थिति और गंभीर है। व्यापारियों के अनुसार ईरानी कीवी का आयात पूरी तरह बंद हो गया है। पहले ईरान से आने वाली कीवी के तीन फलों का एक पैक मात्र ₹30 से ₹35 में मिल जाता था। अब न्यूजीलैंड की कीवी के तीन फलों का पैक ₹60 में बिक रहा है यानी लगभग दोगुनी कीमत। यह बढ़ोतरी सीधे आम उपभोक्ता की जेब पर असर डाल रही है।
Iran-US War: खजूर और पिस्ता – रमजान से पहले दोहरी मार
ड्राई फ्रूट बाजार पर ईरान युद्ध का असर और भी गहरा है। गुलटेकडी मार्केट के ड्राई फ्रूट व्यापारी गोयल के अनुसार ईरान से पांच प्रमुख श्रेणियों के उत्पाद भारत आते हैं जिनमें खजूर, पिस्ता, ममरा बादाम, काली किशमिश, केसर और सूखे अंजीर की करीब दस अलग-अलग किस्में शामिल हैं।
| ड्राई फ्रूट | पहले की कीमत (₹/KG) | अब की कीमत (₹/KG) | बदलाव |
|---|---|---|---|
| ईरानी खजूर (सामान्य) | ₹150–₹300 | ₹200–₹370 | +33% से +50% |
| ईरानी खजूर (प्रीमियम) | ₹1300–₹1400 | ₹1400–₹1500 | +₹100 |
| पिस्ता | सामान्य | उल्लेखनीय वृद्धि | बढ़ रहा है |
खजूर की स्थिति इसलिए और गंभीर है क्योंकि यह रमजान का महीना चल रहा है। रमजान में खजूर की मांग पूरे साल के मुकाबले कई गुना बढ़ जाती है और इफ्तार में खजूर खाना एक महत्वपूर्ण परंपरा है। लेकिन इस बार रमजान से ठीक पहले ईरान युद्ध शुरू होने से आयात रुक गया और बाजार में ‘फर्द’ किस्म के खजूर की गंभीर कमी आ गई है। व्यापारियों को डर है कि अगर मार्च के अंत तक युद्ध नहीं रुका तो खजूर की किल्लत और भी बढ़ सकती है।
Iran-US War: मुंबई बंदरगाह पर 1250 कंटेनर अटके
सिर्फ पुणे ही नहीं, मुंबई के बंदरगाह पर भी भारतीय फल निर्यात पूरी तरह ठप हो गया है। खाड़ी देशों को भेजे जाने वाले फलों के करीब 1250 कंटेनर मुंबई बंदरगाह पर फंसे हुए हैं। इन कंटेनरों में केले, अंगूर, अनार और अन्य फल भरे हैं जो अब न आगे जा सकते हैं और न वापस आ सकते हैं। इससे निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा है।
Iran-US War: पंजाब में यूरिया संकट – NFL प्लांट बंद
ईरान युद्ध का असर सिर्फ फल और ड्राई फ्रूट तक सीमित नहीं है। पंजाब में नंगल और बठिंडा के NFL (नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड) प्लांट बंद हो गए हैं जिससे यूरिया की सप्लाई पर असर पड़ा है। इन प्लांटों में गैस की कमी हो गई है क्योंकि LPG और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित हुई है। पंजाब, हरियाणा और आसपास के राज्यों में रबी सीजन के अंत और खरीफ की तैयारी के बीच यह खाद संकट किसानों के लिए नई मुसीबत बन सकता है।
Iran-US War: किसानों की दोहरी मार – आयात महंगा, निर्यात बंद
ईरान युद्ध ने एक विचित्र स्थिति पैदा की है जहां एक तरफ आयातित ईरानी उत्पाद महंगे हो रहे हैं और दूसरी तरफ भारतीय किसानों की फसल की कीमतें गिर रही हैं।
दरअसल भारत खाड़ी देशों को बड़ी मात्रा में फल निर्यात करता है। सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, बहरीन और कतर जैसे देशों में भारतीय केले, अंगूर, तरबूज, अनार और खरबूजे की अच्छी मांग है। लेकिन अब युद्ध के कारण इन देशों को निर्यात लगभग ठप हो गया है।
जो फल पहले खाड़ी देशों को भेजे जाते थे वे अब घरेलू मंडियों में आ रहे हैं। इससे स्थानीय बाजार में अचानक सप्लाई बढ़ गई है और कीमतें गिर गई हैं। केला, अंगूर, तरबूज, अनार और खरबूजे की कीमतें घरेलू मंडियों में नीचे आ गई हैं। किसान को उतना दाम नहीं मिल रहा जितना पहले मिलता था।
Iran-US War: सोलापुर में केला निर्यात पर संकट
महाराष्ट्र के सोलापुर में केला उत्पादक किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं। सोलापुर क्षेत्र में केले की खेती बड़े पैमाने पर होती है और यहां का केला खाड़ी देशों में लोकप्रिय है। अब निर्यात बंद होने से यहां के हजारों किसानों की आमदनी पर सीधा असर पड़ा है। केले की पैदावार तो उतनी ही है लेकिन बाजार नहीं है जिससे कीमतें दबाव में हैं।
Iran-US War: आगे क्या – व्यापारियों की चिंता
व्यापारियों और बाजार विशेषज्ञों को सबसे ज्यादा डर आम के सीजन को लेकर है। गुड़ी पड़वा के बाद अप्रैल-मई में आम का सीजन शुरू होगा। भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है और खाड़ी देश भारतीय आम के सबसे बड़े खरीदार हैं। अगर तब तक युद्ध नहीं रुका तो भारतीय आम के लिए निर्यात बाजार बंद रह सकता है। इससे घरेलू बाजार में आम की भारी अधिकता होगी और किसानों को औने-पौने दाम पर फसल बेचनी पड़ेगी।
Iran-US War: JNPA ने दी निर्यातकों को राहत
इस संकट के बीच एक राहत की खबर भी आई है। जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी यानी JNPA ने पश्चिम एशिया संकट से प्रभावित निर्यातकों को पोर्ट चार्ज में बड़ी छूट देने की घोषणा की है। यह छूट स्वचालित रूप से मिलेगी यानी निर्यातकों को अलग से आवेदन नहीं करना होगा। इससे निर्यातकों को कुछ राहत तो मिलेगी लेकिन जब तक समुद्री रास्ते नहीं खुलते और खाड़ी देशों को आपूर्ति सामान्य नहीं होती तब तक मूल समस्या बनी रहेगी।
Iran-US War: आम उपभोक्ता पर असर
त्योहारी सीजन में यह महंगाई आम घर-परिवारों की जेब पर भारी पड़ रही है। खजूर से रमजान का इफ्तार महंगा हो गया है। सेब और कीवी जैसे फल जो स्वास्थ्य के लिए जरूरी माने जाते हैं और अस्पतालों में बीमारों को खिलाए जाते हैं, वे भी महंगे हो गए हैं। ड्राई फ्रूट जो पहले से ही महंगे थे, अब और पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य पर स्थिति सामान्य नहीं होती और ईरान से आयात फिर शुरू नहीं होता तब तक यह महंगाई जारी रहेगी। भारत सरकार और संबंधित मंत्रालयों को इस स्थिति पर नजर रखनी होगी और जरूरत पड़े तो वैकल्पिक आपूर्ति के रास्ते खोलने होंगे ताकि उपभोक्ताओं और किसानों दोनों को राहत मिल सके।
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