Cotton Import: अमेरिकी कपास का शुल्क-मुक्त आयात, आंकड़ों की रोशनी में देखें किसानों की आशंका और सरकार का पक्ष
Cotton Import: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर देश में जारी बहस में एक प्रमुख मुद्दा कपास के शून्य शुल्क पर आयात का है। किसान संगठन इसे अपने हितों के खिलाफ बता रहे हैं, जबकि सरकार का तर्क है कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं है। सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में यह व्यापार समझौता भारतीय कपास उत्पादकों के लिए खतरा है या फिर यह पहले से चली आ रही प्रथा का विस्तार मात्र है? आइए आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर इस मुद्दे को समझने की कोशिश करते हैं।
Cotton Import: क्या नया है इस समझौते में?
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में जिस बात ने सबसे ज्यादा विवाद खड़ा किया है, वह है अमेरिका से कपास के शून्य आयात शुल्क पर आयात की संभावना। कृषक संगठनों का कहना है कि यदि सस्ती विदेशी कपास बाजार में आएगी, तो घरेलू उत्पादकों को उचित मूल्य नहीं मिलेगा और उनकी आर्थिक स्थिति खराब होगी। हालांकि, व्यापार विश्लेषकों और सरकारी अधिकारियों का कहना है कि यह पूरी तरह से नई शुरुआत नहीं है। भारत पिछले कई वर्षों से विभिन्न देशों से कपास का आयात करता रहा है, और इनमें अमेरिका भी शामिल है।
वास्तविकता यह है कि भारत विश्व में कपास उत्पादन में दूसरे स्थान पर है, फिर भी कुछ विशेष प्रकार की कपास की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आयात करना पड़ता है। विशेषकर एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास की मांग को घरेलू उत्पादन से पूरा नहीं किया जा सकता, जिसके लिए विदेशी स्रोतों पर निर्भरता बनी रहती है।
Cotton Import: पांच वर्षों का आयात डेटा
डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ कमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टैटिस्टिक्स (DGCI&S), कोलकाता के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में भारत ने कई देशों से कपास का आयात किया है। इन देशों में अमेरिका, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, माली, मिस्र, कोटे डी आइवर, तंजानिया, इजराइल, ग्रीस, सूडान और कई अन्य देश शामिल हैं।
आंकड़े बताते हैं कि कपास का आयात भारत के लिए नई बात नहीं है। हालांकि इसकी मात्रा और स्रोत वर्षों के साथ बदलते रहे हैं, लेकिन यह प्रक्रिया निरंतर चलती रही है। अमेरिका लगातार प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में से एक रहा है, लेकिन यह एकमात्र स्रोत नहीं है। ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से भी बड़ी मात्रा में कपास की खरीद होती रही है।
Cotton Import: वर्ष 2024-25 प्रमुख आपूर्तिकर्ता देश
चालू वित्तीय वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने कई देशों से कपास खरीदी है। अमेरिका से लगभग 8.56 लाख गांठ कपास का आयात हुआ, जिसका मूल्य 2,908 करोड़ रुपये था। ब्राजील से 8.54 लाख गांठ (2,131 करोड़ रुपये मूल्य) और ऑस्ट्रेलिया से 8.49 लाख गांठ (2,367 करोड़ रुपये मूल्य) का आयात किया गया।
इसके अलावा माली से 2.91 लाख गांठ (770 करोड़ रुपये), मिस्र से 1.41 लाख गांठ (687 करोड़ रुपये) और अन्य विभिन्न देशों से मिलाकर 9.32 लाख गांठ (2,504 करोड़ रुपये) का आयात हुआ। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि अमेरिका मुख्य आपूर्तिकर्ताओं में है, लेकिन भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए विविध स्रोतों पर निर्भर करता है।
Cotton Import: पांच साल का रुझान – उतार-चढ़ाव की कहानी
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2020-21: इस वर्ष कुल आयात 11.02 लाख गांठ रहा। अमेरिका और मिस्र प्रमुख आपूर्तिकर्ता थे, जबकि ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील से अपेक्षाकृत कम मात्रा में खरीद हुई।
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2021-22: यह वर्ष आयात में उछाल का वर्ष रहा। कुल आयात बढ़कर 21.13 लाख गांठ हो गया, जो पिछले वर्ष से लगभग दोगुना था। अमेरिका से आयात में महत्वपूर्ण वृद्धि देखी गई। ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों से भी भारी मात्रा में खरीद की गई।
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2022-23: इस वर्ष आयात घटकर 14.59 लाख गांठ रह गया। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से आयात में कमी आई, जबकि मिस्र एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बना रहा। यह संकेत देता है कि या तो घरेलू उत्पादन बेहतर था या वैश्विक मूल्यों में परिवर्तन के कारण आयात में कमी आई।
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2023-24: कुल आयात 15.19 लाख गांठ रहा, जो पिछले वर्ष से थोड़ा अधिक था। अमेरिका से आयात और घटा, जबकि ऑस्ट्रेलिया और मिस्र महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बने रहे। तंजानिया और कोटे डी आइवर की हिस्सेदारी में वृद्धि हुई।
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2024-25: यह वर्ष रिकॉर्ड स्तर के आयात का वर्ष रहा। कुल खरीद 41.39 लाख गांठ तक पहुंच गई, जो पांच वर्षों में सर्वाधिक थी। अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया तीनों से बड़े पैमाने पर आयात किया गया। अन्य देशों की हिस्सेदारी भी काफी बड़ी रही। यह भारी वृद्धि संकेत करती है कि या तो घरेलू उत्पादन में कमी रही, या कपड़ा उद्योग की मांग असाधारण रूप से अधिक थी, या विशेष श्रेणी की कपास की आवश्यकता बढ़ी।
Cotton Import: आयात की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
भारत में कपास का व्यापक उत्पादन होने के बावजूद आयात की आवश्यकता कई कारणों से पड़ती है। सबसे महत्वपूर्ण कारण है एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल कपास की घरेलू उपलब्धता का अभाव। ELS कपास के रेशे बहुत लंबे और महीन होते हैं, जो उच्च गुणवत्ता के कपड़ों के निर्माण में उपयोग होते हैं। भारत में मुख्यतः मध्यम और छोटे रेशे वाली कपास का उत्पादन होता है।
कपड़ा उद्योग, विशेषकर निर्यात के लिए उच्च गुणवत्ता के कपड़े बनाने वाली इकाइयों को ELS कपास की आवश्यकता होती है। यदि यह उपलब्ध नहीं होती, तो भारतीय कपड़ा उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। इसलिए सरकार को इस विशेष श्रेणी की कपास का आयात सुनिश्चित करना पड़ता है। इसके अलावा, कुछ वर्षों में घरेलू उत्पादन कम हो जाता है। मौसम की प्रतिकूलता, कीट और रोग का प्रकोप, या अन्य कृषि संबंधी समस्याओं के कारण उत्पादन प्रभावित होता है।
Cotton Import: सरकार का पक्ष “शुल्क-मुक्त आयात का तर्क”
सरकार का तर्क है कि कपास पर आयात शुल्क में छूट देना कोई नई नीति नहीं है। यह समय-समय पर घरेलू उद्योग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष अगस्त 2025 में सरकार ने कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क (5% BCD, 5% AIDC, 1% SWC) में छूट की घोषणा की थी।
यह छूट 19 अगस्त 2025 से 30 सितंबर 2025 तक लागू थी। बाद में राजस्व विभाग ने 28 अगस्त 2025 को एक अधिसूचना जारी कर इस छूट को 31 दिसंबर 2025 तक बढ़ा दिया। हालांकि, 1 जनवरी 2026 से कपास पर मानक 11 प्रतिशत आयात शुल्क फिर से लागू कर दिया गया। सरकार ऐसी छूट क्यों देती है? इसके पीछे कई कारण हैं:
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कपड़ा उद्योग को उच्च गुणवत्ता का पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध कराना।
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मूल्य वर्धन को बढ़ावा देना।
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रोजगार सृजन।
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अप्रत्यक्ष राजस्व में वृद्धि।
Cotton Import: किसान संगठनों की चिंताएं वैध हैं?
किसान संगठनों की चिंताएं पूरी तरह से निराधार नहीं कहीं जा सकतीं। उनका मुख्य तर्क यह है कि अमेरिका जैसे देश से शून्य शुल्क पर कपास का आयात घरेलू बाजार में कीमतों पर नकारात्मक दबाव डाल सकता है। अमेरिका में किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है, जिससे उनका उत्पादन सस्ता हो जाता है। यदि यह सस्ती कपास भारतीय बाजार में बिना किसी शुल्क के आती है, तो घरेलू किसानों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान हो सकता है। दूसरी चिंता यह है कि यदि आयात की मात्रा नियंत्रित नहीं की गई, तो बाजार में अत्यधिक आपूर्ति से कीमतें गिर सकती हैं।
Cotton Import: विशेषज्ञों का विश्लेषण, संतुलित दृष्टिकोण
कृषि और व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा उतना सरल नहीं है जितना दिखता है। एक ओर घरेलू किसानों के हितों की रक्षा जरूरी है, दूसरी ओर कपड़ा उद्योग की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखना होगा। कई विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने केवल ELS कपास के आयात के लिए छूट दी है, और वह भी एक निर्धारित कोटे के तहत। यह कोटा घरेलू उत्पादन को गंभीर क्षति पहुंचाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
Cotton Import: मुख्य बिंदु संक्षेप में
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भारत पिछले 5 वर्षों से अमेरिका समेत कई देशों से कपास आयात करता रहा है
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2024-25 में अमेरिका से 8.56 लाख गांठ (2,908 करोड़ रुपये) का आयात
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ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया भी प्रमुख आपूर्तिकर्ता, आयात में विविधता
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पांच साल में 2024-25 रिकॉर्ड आयात वर्ष, कुल 41.39 लाख गांठ
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ELS कपास की घरेलू उपलब्धता कम, आयात जरूरी
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सरकार ने पहले भी समय-समय पर शून्य शुल्क की छूट दी है
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कपड़ा उद्योग को उच्च गुणवत्ता के कच्चे माल की आवश्यकता
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किसान संगठनों की चिंता: घरेलू कीमतों पर दबाव
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विशेषज्ञों का सुझाव: संतुलित नीति और घरेलू उत्पादन में सुधार
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दीर्घकालिक लक्ष्य: ELS कपास का घरेलू उत्पादन बढ़ाना
नोट: यह विश्लेषण सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। व्यापार समझौते के अंतिम प्रावधान और उनका वास्तविक प्रभाव समय के साथ स्पष्ट होगा।
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