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  • पीएम कुसुम योजना: यूपी में 90% सब्सिडी पर 40,521 सोलर पंप जारी | ऑनलाइन आवेदन शुरू

    पीएम कुसुम योजना: यूपी में 90% सब्सिडी पर 40,521 सोलर पंप जारी | ऑनलाइन आवेदन शुरू

    यूपी में PM कुसुम योजना के तहत किसानों को बड़ी सौगात: 40,521 सोलर पंप सब्सिडी पर, 15 दिसंबर तक करें आवेदन 

    पीएम कुसुम योजना: यूपी में 90% सब्सिडी पर 40,521 सोलर पंप जारी | ऑनलाइन आवेदन शुरू

    उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए इस बार सूरज नई उम्मीद लेकर आया है। योगी सरकार ने PM कुसुम योजना के तहत वर्ष 2025-26 में राज्य के अन्नदाताओं को कुल 40,521 सोलर पंप सब्सिडी पर उपलब्ध कराने की घोषणा की है। यह योजना उन किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जो लंबे समय से महंगी बिजली, डीज़ल की बढ़ती लागत और लगातार बदलते मौसम के कारण सिंचाई को लेकर संघर्ष कर रहे थे। सरकार का दावा है कि सौर ऊर्जा आधारित पंप किसानों को न सिर्फ ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाएंगे, बल्कि उत्पादन लागत में भी भारी कमी लाएँगे।

    इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसानों को 15 दिसंबर तक कृषि विभाग की आधिकारिक वेबसाइट www.agriculture.up.gov.in पर आवेदन करना होगा। यह पूरा प्रोसेस ऑनलाइन है और किसान अपने घर बैठे मोबाइल या कंप्यूटर से आवेदन कर सकते हैं। सबसे खास बात यह है कि सोलर पंप उन्हीं किसानों को मिलेगा जो इस पोर्टल पर पंजीकरण कर चुके होंगे, और उनका चयन ई-लॉटरी सिस्टम के तहत किया जाएगा। यह प्रक्रिया योजना की पारदर्शिता और निष्पक्षता को सुनिश्चित करती है।

    सरकार ने इस वर्ष 9 प्रकार के सोलर पंप उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया है। इनमें डीसी, एसी सरफेस पंप और अलग-अलग क्षमता वाले सबमर्सिबल पंप शामिल हैं। हर श्रेणी पर केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अलग-अलग अनुदान तय है, जिससे किसान अपनी जरूरत, पानी की गहराई और फसल के अनुसार मॉडल चुन सकें। योजना का स्पष्ट उद्देश्य है—किसानों की लागत कम करना, जल प्रबंधन सुधारना और ग्रामीण क्षेत्रों को स्वच्छ, निःशुल्क ऊर्जा से सशक्त बनाना।

    सब्सिडी के रूप में मिलने वाली राशि इस योजना की सबसे बड़ी ताकत है। उदाहरण के लिए 2 HP DC/AC सरफेस पंप पर राज्य सरकार की ओर से ₹56,737 और केंद्र सरकार की ओर से ₹41,856 का अनुदान दिया जाएगा। यानी एक किसान को कुल लगभग ₹98,593 की राहत। इसी तरह 2 HP DC सबमर्सिबल पंप पर ₹1,00,215, 2 HP AC सबमर्सिबल पर ₹99,947, 3 HP DC सबमर्सिबल पर ₹1,33,621, और 3 HP AC सबमर्सिबल पर ₹1,32,314 का अनुदान दिया जाएगा। इन सभी में राज्य और केंद्र दोनों की हिस्सेदारी शामिल है।

    बड़ी क्षमताओं पर मिलने वाला अनुदान और भी आकर्षक है। 5 HP AC सबमर्सिबल पर ₹1,88,038, जबकि 7.5 HP और 10 HP AC सबमर्सिबल पंपों पर किसानों को करीब ₹2,54,983 तक का लाभ मिलेगा। इनमें राज्य सरकार लगभग ₹1,40,780 और केंद्र सरकार ₹1,14,203 की राशि वहन करेगी। यह भारी अनुदान किसानों के लिए उन पंपों को भी सुलभ बना रहा है, जो पहले उनकी पहुंच से बाहर थे।

    सरकार ने आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए टोकन मनी सिर्फ ₹5,000 रखी है। किसान जब ऑनलाइन बुकिंग करेंगे तो उन्हें यह राशि जमा करनी होगी। बुकिंग कन्फर्म होते ही किसानों के पंजीकृत मोबाइल नंबर पर सूचना भेज दी जाएगी। इसके बाद उन्हें शेष राशि—जो अनुदान घटाने के बाद बचती है—ऑनलाइन जमा करनी होगी। यदि कोई किसान शेष राशि बैंक से ऋण लेकर जमा करता है, तो उसे AIF (कृषि अवसंरचना निधि) के तहत ब्याज में कुल 6% (केंद्र 3% + राज्य 3%) की विशेष छूट मिलेगी। यह सुविधा किसानों की वित्तीय बोझ कम करने में अहम भूमिका निभाएगी।

    योजना में कुछ तकनीकी नियम भी जोड़े गए हैं जिनका पालन किसानों के लिए अनिवार्य है। जैसे—2 HP पंपों के लिए 4 इंच, 3 व 5 HP पंपों के लिए 6 इंच, और 7.5 व 10 HP पंपों के लिए 8 इंच की बोरिंग आवश्यक है। यह बोरिंग किसान को स्वयं करवानी होगी और सत्यापन के समय बोरिंग न मिलने पर टोकन मनी जब्त हो जाएगी। गहराई के आधार पर पंपों की उपयुक्तता भी बताई गई है—जैसे 2 HP सबमर्सिबल 50 फीट गहराई तक, 3 HP 150 फीट तक, 5 HP 200 फीट तक और 10 HP तक के पंप 300 फीट तक के जल स्तर पर प्रभावी ढंग से काम करते हैं।

    कृषि विभाग ने जिला-स्तर पर भी लक्ष्य निर्धारित किए हैं। पोर्टल पर 2 HP और 3 HP पंपों का संयुक्त लक्ष्य दिखाया जाएगा, और किसान अपनी सिंचाई जरूरत के अनुसार मॉडल का चयन कर सकेंगे। यह माइक्रो प्लानिंग किसानों को संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में प्रेरित करेगी।

    PM कुसुम योजना किसानों की जिंदगी में नई ऊर्जा भर रही है। स्वच्छ ऊर्जा, कम खर्च, आसान रखरखाव और लंबे समय तक चलने वाले सोलर पंप खेती को अधिक लाभदायक बना रहे हैं। सरकार का मानना है कि इससे किसानों की आय में वृद्धि, सिंचाई में स्थिरता और ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। डीज़ल पर निर्भरता कम होने से पर्यावरणीय लाभ भी होगा।

    कुल मिलाकर, यह योजना यूपी के किसानों के लिए बड़ा अवसर है। सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसान समय रहते आवेदन करें और इस सुनहरे मौके का लाभ उठाएँ।

    15 दिसंबर अंतिम तिथि है।

    किसान यदि सूरज की ऊर्जा को अपने खेत का साथी बनाना चाहते हैं, तो यह सही समय है। 

  • मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना: 42 लाख पशुओं का मुफ्त बीमा लाभ

    मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना: 42 लाख पशुओं का मुफ्त बीमा लाभ

    मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना से मिलेगा पशुपालकों को बड़ा आर्थिक सुरक्षा कवच, 42 लाख पशुओं का होगा निःशुल्क बीमा


    राजस्थान सरकार ने पशुपालकों को आर्थिक सुरक्षा और जोखिम कवरेज प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना को अब और व्यापक रूप में लागू करने का बड़ा निर्णय लिया है। वर्ष 2024-25 में प्रारंभ हुई इस योजना को वित्तीय वर्ष 2025-26 में विस्तृत किया गया है। सरकार की बजट घोषणा के अनुसार इस वर्ष कुल 42 लाख पशुओं का निःशुल्क बीमा किया जाएगा, जिसमें पिछले वर्ष बीमा किए गए 21 लाख पशु भी शामिल होंगे। यह राज्य के पशुपालकों के लिए एक महत्वपूर्ण राहत और सुरक्षा प्रदान करने वाला कदम माना जा रहा है।

    राजस्थान में पशुपालन ग्रामीण परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार है और कई परिवार अपने पशुधन पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में पशुओं की आकस्मिक मृत्यु होने पर उनकी आर्थिक स्थिति पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए इस योजना का उद्देश्य पशुपालकों को आर्थिक सहारा, स्थिर आय और पशुधन संरक्षण प्रदान करना है। राज्य सरकार इस योजना को ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में एक प्रभावी नीति मान रही है।

    योजना के तहत जनाधार कार्ड धारक पशुपालक पात्र होंगे। प्रत्येक पात्र परिवार को 2 दुधारू गाय, 2 दुधारू भैंस, 1-1 गाय-भैंस, 10 बकरियां, 10 भेड़ें और 10 उष्ट्रवंशीय पशु (ऊंट) का पूरी तरह निःशुल्क बीमा मिलेगा। यह प्रावधान विशेष रूप से सीमांत और छोटे पशुपालकों के लिए बड़ी राहत साबित होगा, जिनके लिए पशुधन ही आय का प्रमुख साधन होता है।

    योजना में पशुओं का मूल्य निर्धारण (Valuation) भी बेहद स्पष्ट और पारदर्शी रखा गया है। दुधारू गाय की कीमत उसके दूध उत्पादन के आधार पर प्रति लीटर प्रतिदिन ₹3000 और दुधारू भैंस की कीमत प्रति लीटर प्रतिदिन ₹4000 के मानक पर तय की जाएगी। हालांकि दोनों ही मामलों में अधिकतम बीमा राशि ₹40,000 तक सीमित रहेगी। वहीं बकरी और भेड़ जैसे छोटे पशुओं की अधिकतम कीमत ₹4,000 प्रति पशु, और ऊंट की कीमत ₹40,000 प्रति पशु निर्धारित की गई है। मूल्यांकन के दौरान यदि किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न होता है तो पशु चिकित्सक का निर्णय अंतिम माना जाएगा। यह प्रावधान योजना को भरोसेमंद और निष्पक्ष बनाता है।

    इस योजना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे पशुपालकों को आकस्मिक मृत्यु पर आर्थिक मुआवजा प्राप्त होगा, जिससे उनकी आय पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। प्राकृतिक आपदाओं, बीमारियों, दुर्घटनाओं और विपरीत परिस्थितियों के कारण अक्सर पशुधन की क्षति होती है, जिससे पशुपालक परिवार कठिनाइयों का सामना करते हैं। लेकिन अब निःशुल्क पशु बीमा मिलने से उन्हें भारी राहत मिलेगी और वे बिना चिंता अपने पशुपालन कार्य को जारी रख सकेंगे। यह कदम ग्रामीण स्थिरता, आर्थिक मजबूती और पशुपालन क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण साबित होगा।

    सरकार का स्पष्ट मानना है कि मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना पशुपालकों के लिए मजबूत सुरक्षा कवच बनकर उभरेगी। इससे न केवल पशुपालकों का आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि राज्य में पशुधन उत्पादन, पशु स्वास्थ्य, और पशुपालन आधारित आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। योजना का दायरा बढ़ने से लाखों परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिलना तय है। विशेष रूप से वे किसान और पशुपालक जो संसाधनों की कमी के कारण जोखिम उठाने में असमर्थ होते थे, अब उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी।

    राज्य सरकार की यह पहल ग्रामीण जीवन को स्थिर और सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह योजना न केवल पशुपालकों के आर्थिक नुकसान की भरपाई करेगी, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी मजबूत बनाएगी। लंबे समय में इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार और पशुपालन क्षेत्र में विश्वास और स्थिरता बढ़ेगी। पशुपालकों को इस योजना से मिलने वाला निःशुल्क बीमा लाभ न केवल उनके जीवन में सुरक्षा का भाव लाएगा, बल्कि पूरे प्रदेश में पशुधन विकास को भी नई दिशा प्रदान करेगा।

  • एनएफडीपी कार्यक्रम से मछुआरों को नई राहत | कोच्चि में केंद्रीय मंत्री का बड़ा ऐलान

    एनएफडीपी कार्यक्रम से मछुआरों को नई राहत | कोच्चि में केंद्रीय मंत्री का बड़ा ऐलान

    केंद्रीय राज्य मंत्री श्री जॉर्ज कुरियन ने कोच्चि में मत्स्य पालन आउटरीच कार्यक्रम का शुभारंभ किया; एनएफडीपी प्रमाणपत्र वितरित किए

    एनएफडीपी कार्यक्रम से मछुआरों को नई राहत | कोच्चि में केंद्रीय मंत्री का बड़ा ऐलान


    भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र को सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम

    केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री श्री जॉर्ज कुरियन ने आज केरल के एर्नाकुलम जिले के नजरक्कल में आयोजित मत्स्य पालन आउटरीच कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने मछुआरों, मत्स्य पालकों और हितधारकों को संबोधित करते हुए कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य देशभर में राष्ट्रीय मत्स्य विकास कार्यक्रम (NFDP) के तहत पंजीकरण के महत्व को बढ़ावा देना और इससे मिलने वाले लाभों के बारे में व्यापक जागरूकता फैलाना है।

    श्री कुरियन ने कहा कि केंद्र सरकार मछुआरों और मत्स्य पालकों के जीवनस्तर को उन्नत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने उपस्थित समुदाय से आग्रह किया कि वे एनएफडीपी के अंतर्गत पंजीकरण कराकर सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाएं, जिससे मत्स्य क्षेत्र में दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित किया जा सके।


    केरल के नौ तटीय गाँवों में विकसित होंगे आधुनिक मत्स्य केंद्र

    कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री ने बताया कि केरल के नौ एकीकृत तटीय गाँवों को विशेष रूप से विकास के लिए चयनित किया गया है। इन गाँवों में प्रसंस्करण केंद्र, कियोस्क और सामुदायिक केंद्र जैसी अत्याधुनिक सुविधाएँ स्थापित की जाएंगी।

    उन्होंने कहा कि यह परियोजनाएँ केंद्र सरकार द्वारा 2 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ पूरी तरह से वित्त पोषित होंगी। इन परियोजनाओं का उद्देश्य जलवायु-अनुकूल, तकनीकी रूप से सक्षम और सतत मत्स्य पालन प्रणाली को बढ़ावा देना है।
    राज्य सरकार इन लाभार्थी गाँवों की पहचान करेगी और कार्यान्वयन की दिशा में आवश्यक कदम उठाएगी।


    भारत बनेगा विश्व का सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश

    श्री जॉर्ज कुरियन ने अपने संबोधन में यह भी उल्लेख किया कि भारत वर्तमान में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत को विश्व का सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक बनाने का संकल्प लिया गया है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा,

    “हमारा लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि मत्स्य पालकों की आय को दोगुना करना और उन्हें आधुनिक तकनीक, अवसंरचना व विपणन सहायता प्रदान करना भी है।”

    उन्होंने मछुआरों और मत्स्य पालकों से इस मिशन में भागीदार बनने और भारत को वैश्विक मत्स्य क्षेत्र में अग्रणी बनाने की दिशा में सामूहिक प्रयास करने का आग्रह किया।


    सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र के साथ आगे बढ़ता भारत

    कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के विकास मंत्र —

    “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” — का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में हर नागरिक की भूमिका अहम है।

    उन्होंने कहा कि मत्स्य क्षेत्र में विकास तभी संभव है जब केंद्र और राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, निजी क्षेत्र और मत्स्य समुदाय एकजुट होकर कार्य करें।

    “मछुआरे हमारे समुद्री राष्ट्र की रीढ़ हैं। उनके सशक्तीकरण के बिना तटीय विकास और समुद्री अर्थव्यवस्था का विस्तार संभव नहीं है।”


    किसान क्रेडिट कार्ड और एनएफडीपी प्रमाणपत्रों का वितरण

    इस अवसर पर श्री जॉर्ज कुरियन ने मछुआरों और मत्स्य पालकों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), ट्रांसपोंडर, और एनएफडीपी पंजीकरण प्रमाणपत्र वितरित किए।
    इन प्रमाणपत्रों के माध्यम से लाभार्थियों को सरकारी योजनाओं, ऋण सुविधाओं और बीमा कवरेज का लाभ मिलेगा।

    उन्होंने कहा कि केसीसी के माध्यम से मछुआरे अब कम ब्याज दरों पर ऋण प्राप्त कर सकेंगे, जिससे वे अपने व्यवसाय का विस्तार कर सकेंगे और बेहतर मछली पालन तकनीक अपना सकेंगे।


    स्थायी मत्स्य पालन और आजीविका संवर्धन पर जोर

    आउटरीच कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य मत्स्य समुदाय को सतत मत्स्य पालन (Sustainable Fisheries) के प्रति जागरूक करना था।
    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ऐसी नीतियाँ बना रही है जो मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ मछुआरों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करेंगी।

    उन्होंने बताया कि सरकार ने हाल के वर्षों में ब्लू इकोनॉमी, इंटीग्रेटेड कोस्टल विलेज डेवलपमेंट, और आधुनिक मत्स्य प्रसंस्करण अवसंरचना पर विशेष ध्यान दिया है, जिससे ग्रामीण तटीय अर्थव्यवस्था को नया आयाम मिला है।


    हितधारकों के साथ संवाद और भविष्य की रणनीति

    कार्यक्रम के दौरान श्री जॉर्ज कुरियन ने मछुआरों, मत्स्य पालकों, सहकारी समितियों और उद्योग प्रतिनिधियों से खुलकर संवाद किया।
    उन्होंने उनकी समस्याओं, चुनौतियों और अपेक्षाओं को सुना तथा केरल के मत्स्य पालन व जलीय कृषि क्षेत्र को और अधिक मज़बूत बनाने के उपायों पर चर्चा की।

    मंत्री ने कहा कि सरकार अब ऐसे कार्यक्रमों को “ग्राउंड लेवल कनेक्ट” के रूप में देख रही है, जहाँ सीधे संवाद के माध्यम से नीतिगत निर्णयों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जा सके।
    इससे न केवल योजनाओं के लाभार्थियों की भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।


    केंद्र सरकार की योजनाएँ: मत्स्य समुदाय के लिए नई ऊर्जा

    केंद्रीय मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार की अनेक योजनाएँ जैसे —

    प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY),

    ब्लू रेवोल्यूशन,

    मरीन फिशरीज इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट स्कीम,

    फिशरमेन वेलफेयर फंड,
    और राष्ट्रीय मत्स्य विकास कार्यक्रम (NFDP)
    मत्स्य क्षेत्र को नई दिशा दे रही हैं।

    उन्होंने कहा कि इन योजनाओं का उद्देश्य मछुआरों की सुरक्षा, आजीविका, और आर्थिक सशक्तीकरण को सुनिश्चित करना है।


    कार्यक्रम बना सरकार और समुदाय के बीच सीधा संवाद मंच

    नजरक्कल में आयोजित यह आउटरीच कार्यक्रम केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि सरकार और मत्स्य समुदाय के बीच सीधा संवाद मंच बना।
    इससे केंद्र सरकार को स्थानीय स्तर पर योजनाओं के प्रभाव को समझने और भविष्य के लिए नीतिगत दिशा तय करने में मदद मिलेगी।

    कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, राज्य सरकार के अधिकारियों, मत्स्य विभाग के विशेषज्ञों, और सैकड़ों मछुआरों ने भाग लिया।


    निष्कर्ष: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सशक्त मत्स्य क्षेत्र

    कार्यक्रम के अंत में श्री जॉर्ज कुरियन ने कहा कि मत्स्य पालन क्षेत्र न केवल तटीय अर्थव्यवस्था का आधार है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के विजन का अभिन्न हिस्सा भी है।
    उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में भारत न केवल मत्स्य उत्पादन में अग्रणी होगा, बल्कि निर्यात, मूल्य संवर्धन और रोजगार सृजन के क्षेत्र में भी नए मानक स्थापित करेगा।

  • दीनदयाल अंत्योदय योजना: महिलाओं और ग्रामीण भारत की सशक्त कहानी

    दीनदयाल अंत्योदय योजना: महिलाओं और ग्रामीण भारत की सशक्त कहानी

    दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM): ग्रामीण सशक्तिकरण का नया खाका


    ग्रामीण भारत के आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर मिशन

    भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) देश के सबसे सफल गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों में से एक है। इस मिशन का उद्देश्य ग्रामीण गरीब परिवारों को आत्मनिर्भर बनाना, उन्हें स्थायी आजीविका से जोड़ना और आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। 2010 में शुरू हुए इस मिशन ने आज करोड़ों ग्रामीण परिवारों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाया है।


    10 करोड़ ग्रामीण परिवारों का सामूहिक सशक्तिकरण

    मिशन के अंतर्गत अब तक 10.05 करोड़ ग्रामीण परिवारों को 90.9 लाख स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में संगठित किया गया है। इन समूहों ने न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया है, बल्कि सामाजिक समानता, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्र में भी नई सोच विकसित की है।

    इन स्वयं सहायता समूहों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इन्हें महिलाएं स्वयं संचालित करती हैं। क्रेडिट लिंकिंग, उद्यमिता प्रशिक्षण, कृषि एवं पशुपालन गतिविधियों, और सरकारी योजनाओं के लाभ तक पहुंच जैसे कार्य इन्हीं समूहों के माध्यम से होते हैं।


    महिला किसानों और उद्यमियों की नई पहचान

    DAY-NRLM ने ग्रामीण महिलाओं को ‘महिला किसान (Mahila Kisan)’ के रूप में सशक्त किया है। देशभर में अब तक 4.62 करोड़ महिलाएं इस पहल के तहत कृषि आधारित गतिविधियों से जुड़ी हैं। इन महिलाओं को कृषि साथी (Krishi Sakhi) और पशु साथी (Pashu Sakhi) जैसी प्रशिक्षित ग्रामीण कार्यकर्ता मदद प्रदान करती हैं। ये साथी सालभर कृषि तकनीक, पशुपालन, और बाजार जोड़ने में सहयोग देती हैं।

    इसी तरह, Start-up Village Entrepreneurship Programme (SVEP) के तहत 3.74 लाख ग्रामीण उद्यमों की स्थापना की गई है। इन उद्यमों में हस्तशिल्प, फूड प्रोसेसिंग, ग्रामीण उत्पाद विपणन और स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है।


    वित्तीय समावेशन में महिलाओं की अग्रणी भूमिका

    DAY-NRLM ने वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। देशभर की महिला स्वयं सहायता समूहों को अब तक ₹11 लाख करोड़ रुपये का ऋण वितरित किया गया है। यह ऋण बिना किसी जमानत के और ब्याज सब्सिडी के साथ दिया गया है।

    47,952 बैंक साथी (Bank Sakhis) ग्रामीण बैंकों में तैनात हैं जो SHG समूहों को बैंकिंग सेवाओं, ऋण प्राप्ति और वित्तीय साक्षरता में सहायता करती हैं। इन महिलाओं के प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विश्वास और पारदर्शिता बढ़ी है, जिसका प्रमाण 98% से अधिक ऋण पुनर्भुगतान दर है।


    एक प्रेरणादायक उदाहरण: मेघालय की हैनीडामांकी कनाई

    मेघालय की रहने वाली हैनीडामांकी कनाई की कहानी मिशन की सफलता का जीवंत उदाहरण है। 2020 में उन्होंने “किर्शनलांग” स्वयं सहायता समूह से जुड़कर हस्तनिर्मित साबुन बनाने का कार्य शुरू किया। मिशन और समूह के सहयोग से उन्होंने बैंक से ₹1.8 लाख का ऋण लिया और अपने व्यवसाय को विस्तार दिया।
    आज वह न केवल सालाना ₹1 लाख से अधिक कमाती हैं, बल्कि अपने गांव की अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना रही हैं।


    कौशल विकास से रोजगार तक – युवाओं के लिए अवसर

    DAY-NRLM के अंतर्गत दो प्रमुख योजनाएँ ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसर उपलब्ध करा रही हैं:

    1. दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY):
      15–35 वर्ष की आयु के ग्रामीण युवाओं को उद्योग आधारित प्रशिक्षण और प्लेसमेंट प्रदान किया जाता है। अब तक 17.5 लाख युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया है और 11.48 लाख युवाओं को रोजगार मिल चुका है।

    2. ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (RSETI):
      बैंक प्रायोजित ये संस्थान 18–50 वर्ष के युवाओं को उद्यमिता प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। अब तक 56.69 लाख युवाओं को प्रशिक्षण और 40.99 लाख युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ा गया है।


    राज्यों का प्रदर्शन और उपलब्धियाँ

    देश के कई राज्यों ने DAY-NRLM के कार्यान्वयन में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है:

    • उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश ने सबसे अधिक महिलाओं को SHG नेटवर्क से जोड़ा है।
    • वित्तीय सहायता के मामले में उत्तर प्रदेश (₹1,23,326 लाख) और बिहार (₹1,05,132 लाख) अग्रणी हैं।
    • आंध्र प्रदेश ने SHGs को ₹34,83,725 लाख का बैंक ऋण वितरित कर देश में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है।
    • महिला किसान कार्यक्रम में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश अग्रणी हैं, जबकि उद्यमिता कार्यक्रम (SVEP) में असम, केरल और पश्चिम बंगाल ने सराहनीय कार्य किया है।

    उन्नत प्रशिक्षण और विपणन से आत्मनिर्भरता की ओर

    सरकार SHG महिलाओं को विपणन एवं उन्नत कौशल प्रशिक्षण देने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर ‘SARAS आजीविका मेला’ आयोजित करती है। हाल ही में 5–22 सितंबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित मेले में हजारों महिला उद्यमियों ने अपने उत्पाद प्रदर्शित किए।

    इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRD&PR) ने पिछले तीन वर्षों में 44 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए, जिनसे SHG सदस्यों की विपणन क्षमता और प्रबंधन कौशल में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।


    समग्र विकास और सामाजिक परिवर्तन की दिशा में अग्रसर मिशन

    DAY-NRLM न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी प्रतीक बन गया है। मिशन के तहत महिलाओं को घरेलू हिंसा, शिक्षा, पोषण, स्वच्छता और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जागरूक किया जा रहा है। इससे ग्रामीण समाज में महिलाओं की भागीदारी और आत्मनिर्भरता दोनों में वृद्धि हुई है।


    निष्कर्ष: आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की ओर

    दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने ग्रामीण भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को नई दिशा दी है। इसने महिलाओं को सशक्त किया, युवाओं को कौशल प्रदान किया और ग्रामीण समुदायों में स्थायी आजीविका के अवसर सृजित किए।

    DAY-NRLM अब केवल एक योजना नहीं, बल्कि ‘आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत’ के निर्माण का सशक्त माध्यम बन चुकी है — जहाँ हर महिला आत्मविश्वास से भरी है, हर परिवार आत्मनिर्भर है और हर गांव विकास की नई कहानी लिख रहा है।

  • Coal India और IIT Madras मिलकर बनाएंगे Sustainable Energy Centre

    Coal India और IIT Madras मिलकर बनाएंगे Sustainable Energy Centre

    कोल इंडिया लिमिटेड और आईआईटी मद्रास ने मिलकर स्थापित किया “सेंटर फॉर सस्टेनेबल एनर्जी” — भारत की स्वच्छ ऊर्जा क्रांति की दिशा में ऐतिहासिक पहल

    Coal India और IIT Madras मिलकर बनाएंगे Sustainable Energy Centre

    भारत की ऊर्जा यात्रा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास (IIT Madras) के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत आईआईटी मद्रास परिसर में “सेंटर फॉर सस्टेनेबल एनर्जी” की स्थापना की जाएगी, जो भारत की स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में नवाचार और अनुसंधान का केंद्र बनेगा।


    कोल इंडिया और आईआईटी मद्रास का सहयोग – ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में बड़ा कदम

    इस समझौते पर कोल इंडिया लिमिटेड के निदेशक (तकनीकी) श्री अच्युत घटक और आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर कोल इंडिया के अध्यक्ष श्री पी.एम. प्रसाद सहित दोनों संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

    यह सहयोग भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक नई दिशा प्रदान करेगा, जहां परंपरागत कोयला आधारित उद्योग अब सतत और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा तकनीकों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह केंद्र न केवल अनुसंधान एवं विकास (R&D) का केंद्र बनेगा, बल्कि भविष्य के ऊर्जा समाधान खोजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


    सेंटर फॉर सस्टेनेबल एनर्जी – अनुसंधान और नवाचार का केंद्र

    यह केंद्र भारत में सस्टेनेबल एनर्जी टेक्नोलॉजीज पर अत्याधुनिक अनुसंधान करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य कोयला खदानों के पुनः उपयोग, लो-कार्बन टेक्नोलॉजी, और कोयले को स्वच्छ ऊर्जा फीडस्टॉक के रूप में पुनर्परिभाषित करने जैसे क्षेत्रों में अभिनव समाधान विकसित करना है।

    यह पहल कोल इंडिया की विविधीकरण रणनीति (Strategic Diversification Goals) के तहत की गई है, जिससे कंपनी पारंपरिक कोयला उत्पादन के साथ-साथ ग्रीन एनर्जी इनोवेशन में भी अग्रणी भूमिका निभा सके।


    भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों की दिशा में मजबूत कदम

    भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो एमिशन हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। कोल इंडिया और आईआईटी मद्रास के बीच यह साझेदारी इस लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

    कोल इंडिया लिमिटेड के अध्यक्ष, श्री पी.एम. प्रसाद ने इस अवसर पर कहा,

    “कोल इंडिया अब केवल देश की ऊर्जा आपूर्ति का स्तंभ नहीं रहेगा, बल्कि भारत की स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन यात्रा का प्रेरक बनेगा। यह समझौता हमारे सतत विकास के संकल्प को नई दिशा देगा। आईआईटी मद्रास के सहयोग से हम देश में ऊर्जा सुरक्षा, डीकार्बोनाइजेशन और सामाजिक-आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देने वाले स्वदेशी समाधान तैयार करेंगे।”


    आईआईटी मद्रास की दृष्टि – उद्योग और अकादमिक सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण

    आईआईटी मद्रास के निदेशक, प्रो. वी. कामकोटी ने इस अवसर पर कहा,

    “उद्योग और अकादमिक सहयोग ने हमेशा आईआईटी मद्रास की शोध यात्रा को सशक्त किया है। कोल इंडिया के साथ यह साझेदारी हमारे उस दृष्टिकोण को मजबूत करती है, जिसके तहत हम भारत को लो-कार्बन अर्थव्यवस्था की दिशा में अग्रसर कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य ऐसे समाधान विकसित करना है जो बड़े पैमाने पर लागू हों और भारत के सतत ऊर्जा भविष्य का निर्माण करें।”


    मानव संसाधन विकास में भी निभाएगा प्रमुख भूमिका

    “सेंटर फॉर सस्टेनेबल एनर्जी” न केवल अनुसंधान का केंद्र होगा, बल्कि मानव पूंजी विकास (Human Capital Development) में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

    इस केंद्र के माध्यम से पीएचडी, पोस्ट-डॉक्टोरल और इंटर्नशिप कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे, जिससे देश के युवा शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान में काम करने के अवसर मिलेंगे। यह पहल आने वाले वर्षों में भारत की ग्रीन एनर्जी प्रतिभा (Green Energy Talent Pool) को मजबूत बनाएगी।


    कोल इंडिया की नई पहचान – “ब्लैक से ग्रीन” की ओर

    कोल इंडिया, जो दशकों से भारत की ऊर्जा आपूर्ति का आधार रहा है, अब खुद को एक “एनर्जी ट्रांजिशन लीडर” के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है।

    कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों में सोलर पावर, बायो-एनर्जी, और कोयला खदानों के ग्रीन रिक्लेमेशन जैसे प्रोजेक्ट्स पर कार्य शुरू किया है। आईआईटी मद्रास के साथ यह साझेदारी इस दिशा में एक ट्रांसफॉर्मेटिव स्टेप है, जो “ब्लैक एनर्जी से ग्रीन एनर्जी” की ओर कोल इंडिया की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।


    साझेदारी के लाभ – अनुसंधान से उद्योग तक

    इस केंद्र के माध्यम से विकसित तकनीकें न केवल कोल इंडिया के कार्यक्षेत्र में उपयोग होंगी, बल्कि अन्य सार्वजनिक और निजी उद्योगों को भी लाभ पहुंचाएंगी।

    साझेदारी के मुख्य लाभ होंगे:

    1. स्वदेशी तकनीकी समाधान – भारत में विकसित ऊर्जा तकनीकें।
    2. डीकार्बोनाइजेशन के लिए अनुसंधान – उत्सर्जन घटाने वाली नई पद्धतियाँ।
    3. कोयला खदानों का पुनः उपयोग – परित्यक्त खदानों को ऊर्जा हब में बदलना।
    4. ग्रीन हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर जैसे भविष्य के प्रोजेक्ट्स पर फोकस।
    5. युवा शोधकर्ताओं के लिए अवसर – नई ऊर्जा टेक्नोलॉजी में करियर निर्माण।

    भारत के सतत विकास लक्ष्यों की ओर एकजुट प्रयास

    यह पहल भारत के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) — विशेष रूप से Affordable & Clean Energy (Goal 7), Industry, Innovation & Infrastructure (Goal 9) और Climate Action (Goal 13) — को प्राप्त करने में योगदान देगी।

    कोल इंडिया और आईआईटी मद्रास की यह साझेदारी भारत के ऊर्जा आत्मनिर्भरता मिशन (Energy Aatmanirbhar Bharat) का भी अभिन्न हिस्सा है, जो स्वदेशी अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में भारत को अग्रणी बनाएगा।


    निष्कर्ष :

    “सेंटर फॉर सस्टेनेबल एनर्जी” की स्थापना यह स्पष्ट करती है कि भारत अब कोयले को केवल ईंधन नहीं, बल्कि परिवर्तन के उत्प्रेरक (Catalyst for Change) के रूप में देख रहा है।

    यह पहल देश के ऊर्जा तंत्र में एक नए युग की शुरुआत है — जहाँ कोल इंडिया और आईआईटी मद्रास मिलकर भारत को ग्रीन, क्लीन और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य की दिशा में अग्रसर कर रहे हैं।

  • GST ने बढ़ाई Ease of Doing Business में भारत की रफ्तार | Modi Govt Success Story

    GST ने बढ़ाई Ease of Doing Business में भारत की रफ्तार | Modi Govt Success Story

     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में व्यापार सुगमता की दिशा में ऐतिहासिक परिवर्तन – GST बना आर्थिक सशक्तिकरण का स्तंभ

    GST ने बढ़ाई Ease of Doing Business में भारत की रफ्तार | Modi Govt Success Story

    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के गतिशील और दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने पिछले एक दशक में आर्थिक सुधारों और व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business – EoDB) के क्षेत्र में विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नीतियों ने देश की कर प्रणाली, व्यापारिक माहौल और निवेश परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है। इस परिवर्तन के केंद्र में वस्तु एवं सेवा कर (GST) रहा है, जिसने कर प्रणाली को एकीकृत, पारदर्शी और आधुनिक स्वरूप दिया है।


    GST – भारत की कर प्रणाली में क्रांतिकारी सुधार

    वर्ष 2017 में शुरू किया गया वस्तु एवं सेवा कर (GST) भारत के आर्थिक इतिहास की सबसे बड़ी कर सुधार पहल के रूप में जाना जाता है। इससे पहले देश में 17 प्रकार के अलग-अलग कर और 13 उपकर (Cess) लागू थे, जिनसे व्यापारियों और उद्योगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। GST ने इस जटिलता को समाप्त करते हुए एक राष्ट्र, एक कर, एक बाजार की अवधारणा को साकार किया।

    आज 1.4 करोड़ से अधिक व्यवसाय GST प्रणाली के अंतर्गत पंजीकृत हैं। GST पोर्टल के माध्यम से अब टैक्स फाइलिंग, चालान जारी करना, इनवॉइस ट्रैकिंग और कर भुगतान जैसी प्रक्रियाएं पूरी तरह ऑनलाइन हो चुकी हैं। इससे व्यापारिक पारदर्शिता बढ़ी है, समय की बचत हुई है और लालफीताशाही में उल्लेखनीय कमी आई है।


    राजस्व वृद्धि और मजबूत आर्थिक संकेत

    GST लागू होने के बाद भारत के राजस्व संग्रह में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल 2024 में GST संग्रह ₹2.10 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया — जो भारत की आर्थिक मजबूती और कर प्रणाली में बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। यह वृद्धि सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि देश के विकास में भी झलकती है।

    इस राजस्व से केंद्र और राज्य सरकारें अवसंरचना निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, और रोजगार सृजन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में निवेश कर पा रही हैं। सड़क, रेलवे, बिजली, और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में तेजी से प्रगति हुई है। इस प्रकार, GST से प्राप्त राजस्व “विकसित भारत 2047” के विजन को साकार करने में एक प्रमुख साधन बन चुका है।


    डिजिटल इंडिया के साथ कर प्रणाली का पूर्ण डिजिटलीकरण

    प्रधानमंत्री मोदी के डिजिटल इंडिया विजन के तहत GST Network (GSTN) ने कर प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल स्वरूप प्रदान किया है। आज ई-इनवॉइसिंग, ई-वे बिल, और रियल टाइम टैक्स ट्रैकिंग जैसी सुविधाओं ने न केवल पारदर्शिता बढ़ाई है बल्कि भ्रष्टाचार और मानवीय त्रुटियों को भी न्यूनतम किया है।

    70% से अधिक व्यवसाय अब डिजिटल माध्यम से रिटर्न दाखिल कर रहे हैं, जिससे अनुपालन सरल हुआ है और प्रशासनिक लागत में भारी कमी आई है। विशेष रूप से लघु, छोटे और मध्यम उद्यम (MSMEs) के लिए यह बदलाव अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुआ है। अब MSME उद्योग सीमित संसाधनों के बावजूद अपने कर दायित्वों का पालन सरलता से कर पा रहे हैं।


    वैश्विक स्तर पर भारत की साख में उल्लेखनीय वृद्धि

    GST और अन्य आर्थिक सुधारों के कारण भारत की वैश्विक साख में जबरदस्त सुधार हुआ है। विश्व बैंक की “Ease of Doing Business” रैंकिंग में भारत 2014 में 142वें स्थान से बढ़कर 2020 में 63वें स्थान पर पहुंच गया। यह दर्शाता है कि भारत ने न केवल अपनी कर प्रणाली को सरल बनाया है बल्कि व्यापार करने के लिए एक भरोसेमंद वातावरण भी तैयार किया है।

    भारत में अंतरराज्यीय व्यापार अब पहले की तुलना में अधिक सुगम हुआ है। GST ने “वन नेशन, वन मार्केट” की भावना को वास्तविक रूप में लागू किया है। 2024 के भाजपा घोषणापत्र में सरकार ने यह संकल्प लिया है कि आने वाले वर्षों में कर अनुपालन की लागत 20% तक घटाई जाएगी, विशेष रूप से स्टार्टअप्स और डिजिटल उद्यमों के लिए।


    MSME क्षेत्र को मिला नई दिशा और ताकत

    GST का सबसे बड़ा लाभ भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) को मिला है। पहले जहां टैक्स रिफंड, फाइलिंग और कर भुगतान की प्रक्रिया जटिल थी, वहीं अब यह पूरी तरह सरल और डिजिटल हो गई है। इससे MSMEs को अपनी उत्पादकता बढ़ाने और वैश्विक बाजारों तक पहुंचने में सहायता मिली है।

    वर्तमान में भारत के 98% से अधिक MSME उद्योग GST प्रणाली से लाभान्वित हो रहे हैं। इन इकाइयों ने 12 करोड़ से अधिक रोजगार सृजित किए हैं, जो भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना को सशक्त बना रहे हैं। इसके साथ ही, देश का निर्यात FY24 में $418 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो भारतीय उत्पादों की वैश्विक मांग का प्रमाण है।


    व्यापार सुगमता के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही में वृद्धि

    GST ने केवल कर प्रणाली को नहीं बदला, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को भी बढ़ावा दिया है। अब हर लेन-देन ऑनलाइन दर्ज होता है, जिससे टैक्स चोरी और धोखाधड़ी के मामलों में कमी आई है। Input Tax Credit (ITC) की सुविधा ने व्यवसायों को अपने वैध खर्चों पर टैक्स लाभ प्राप्त करने का अवसर दिया है।

    इससे न केवल सरकार के राजस्व में वृद्धि हुई है, बल्कि करदाताओं में भी विश्वास की भावना मजबूत हुई है। अब व्यवसाय यह जानते हैं कि उनके द्वारा दिया गया कर सीधे विकास कार्यों में उपयोग हो रहा है।


    भविष्य की दिशा – 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य

    GST की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि भारत बड़े आर्थिक सुधारों को सफलतापूर्वक लागू करने की क्षमता रखता है। भाजपा सरकार आने वाले वर्षों में कर प्रणाली को और अधिक डिजिटल, पारदर्शी और स्वचालित बनाने की दिशा में अग्रसर है।

    ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के अंतर्गत सरकार का लक्ष्य है कि व्यापारिक माहौल को इतना सरल बनाया जाए कि हर उद्यमी – चाहे वह गांव का छोटा व्यापारी हो या वैश्विक निवेशक – समान अवसरों का लाभ उठा सके।

    नए सुधारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टैक्स एनालिटिक्स, रियल टाइम डेटा मॉनिटरिंग और ऑटो-अपडेटेड फाइलिंग सिस्टम जैसे नवाचार शामिल होंगे, जिससे भारत विश्व का सबसे पारदर्शी और सरल कर शासन मॉडल प्रस्तुत करेगा।


    निष्कर्ष

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह सिद्ध किया है कि आर्थिक सुधार केवल नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा में मील का पत्थर होते हैं। GST ने न केवल व्यापार सुगमता को नई ऊंचाई दी है, बल्कि करदाताओं में विश्वास और पारदर्शिता की भावना भी स्थापित की है।

    भारत आज “Ease of Doing Business” से आगे बढ़कर “Ease of Living” की दिशा में अग्रसर है। यह परिवर्तन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का प्रतीक है।

    “एक भारत – एक कर – एक बाजार” की भावना के साथ भारत अब 2047 तक ‘विकसित राष्ट्र’ बनने की दिशा में दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ रहा है।

  • किसान क्रेडिट कार्ड 2025: 4% ब्याज पर ₹3 लाख तक आसान लोन

    किसान क्रेडिट कार्ड 2025: 4% ब्याज पर ₹3 लाख तक आसान लोन

     किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) – किसानों की समृद्धि का आधार, आसान ऋण पहुँच और कृषि विकास को नई रफ्तार


    भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने और कृषि क्षेत्र में सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना को व्यापक रूप से लागू किया गया है। यह योजना किसानों को न केवल सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराती है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर और सक्षम बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई है।
    कृषि मंत्रालय का लक्ष्य है कि देश का प्रत्येक पात्र किसान इस योजना का लाभ उठाकर अपने कृषि कार्यों, पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसी गतिविधियों को और अधिक सशक्त बना सके।


    किसान क्रेडिट कार्ड योजना – किसानों के लिए वित्तीय सशक्तिकरण का माध्यम

    किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना की शुरुआत किसानों को सस्ती दरों पर त्वरित ऋण सुविधा देने के उद्देश्य से की गई थी। वर्तमान में देशभर में 27.72 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जा चुके हैं। यह न केवल किसानों की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का भी एक प्रमुख साधन बन चुका है।

    इस योजना के तहत किसानों को उनके कृषि कार्यों के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाता है, जिससे उन्हें बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई उपकरण, और कृषि मशीनरी जैसी आवश्यक वस्तुएं खरीदने में किसी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।


    एमआईएसएस (संशोधित ब्याज सहायता योजना) – सस्ती दरों पर ऋण का लाभ

    भारत सरकार ने किसानों को राहत प्रदान करने के उद्देश्य से MISS (Modified Interest Subvention Scheme) को लागू किया है। इस योजना के तहत किसानों को ऋण पर ब्याज दर में विशेष छूट दी जाती है, जिससे उन्हें मात्र 4% की प्रभावी ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध होता है।

    यह योजना किसानों के लिए अत्यंत लाभदायक साबित हुई है क्योंकि इससे उन्हें बैंकिंग प्रणाली से जुड़ने और समय पर ऋण प्राप्त करने की सुविधा मिली है। साथ ही, ब्याज सहायता के रूप में सरकार ने पिछले 11 वर्षों में ₹1.62 लाख करोड़ रुपये की राशि किसानों को प्रदान की है। यह सरकार की किसानों के प्रति प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता को दर्शाता है।


    बढ़ी हुई ऋण सीमा – हर क्षेत्र के लिए सहयोग

    कृषि मंत्रालय ने किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए MISS योजना के अंतर्गत ऋण सीमा को बढ़ाया है। अब किसानों को ₹3 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि वे फसल उत्पादन, बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसी बढ़ती कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।

    इसके अतिरिक्त, ₹2 लाख रुपये तक का संपार्श्विक-मुक्त (Collateral Free) ऋण भी किसानों को प्रदान किया जा रहा है। इसका उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों को प्रोत्साहित करना है, ताकि वे बिना किसी सुरक्षा के भी ऋण प्राप्त कर सकें और अपने कृषि कार्यों को जारी रख सकें।


    कृषि ऋण में निरंतर वृद्धि – आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम

    भारत सरकार ने वर्ष 2024-25 में कृषि अल्पकालिक ऋण को ₹10.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ाया जाएगा, और 2029-30 तक इसे ₹20 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचाने की योजना बनाई गई है।

    यह विस्तार न केवल कृषि उत्पादन को बढ़ावा देगा बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न करेगा। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी और कृषि क्षेत्र को एक नई ऊँचाई मिलेगी।


    कृषि विकास को नई रफ्तार – आत्मनिर्भर किसान, सशक्त भारत

    किसान क्रेडिट कार्ड योजना के माध्यम से किसानों को वित्तीय संसाधनों की त्वरित उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। इस योजना ने किसानों को साहूकारों से मुक्ति दिलाने और औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    अब किसान अपने खेतों में बेहतर तकनीक, उन्नत बीज और आधुनिक कृषि उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे उनकी उत्पादकता में वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप न केवल कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है बल्कि किसानों की जीवन स्तर में भी सुधार आया है।


    सरकार की प्राथमिकता – हर किसान तक योजना की पहुँच

    कृषि मंत्रालय का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि देश का कोई भी पात्र किसान इस योजना से वंचित न रह जाए। इसके लिए राज्यों और बैंकों के सहयोग से KCC अभियान को तीव्र गति से लागू किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष शिविरों के माध्यम से किसानों को इस योजना की जानकारी दी जा रही है और उन्हें ऑन-द-स्पॉट KCC कार्ड उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

    साथ ही, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से आवेदन प्रक्रिया को और अधिक सरल और पारदर्शी बनाया गया है, ताकि किसान घर बैठे इस योजना का लाभ उठा सकें।


    कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की प्रतिबद्धता

    कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि प्रत्येक किसान को आवश्यक वित्तीय सहायता समय पर मिले। मंत्रालय लगातार नीतिगत सुधारों, ब्याज सब्सिडी और तकनीकी नवाचारों के माध्यम से किसानों के हितों की रक्षा कर रहा है।

    यह प्रयास भारत को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


    निष्कर्ष – किसान क्रेडिट कार्ड: किसानों की प्रगति का प्रतीक

    किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना ने किसानों के जीवन में वित्तीय स्थिरता और आत्मनिर्भरता की भावना को सशक्त किया है। आसान ऋण पहुँच, कम ब्याज दरें और बढ़ती ऋण सीमाएँ—ये सभी तत्व मिलकर कृषि विकास को नई गति दे रहे हैं।

    भारत सरकार की यह पहल न केवल “किसान की समृद्धि” बल्कि “देश की समृद्धि” का भी प्रतीक है।
    कृषि मंत्रालय का यह प्रयास है कि भारत के हर खेत में खुशहाली और हर किसान के जीवन में विकास की नई रौशनी पहुँचे।

  • उत्तर प्रदेश में आलू किसानों के लिए खुशखबरी: 800 रुपये प्रति क्विंटल की छूट, जानिए पूरी योजना

    उत्तर प्रदेश में आलू किसानों के लिए खुशखबरी: 800 रुपये प्रति क्विंटल की छूट, जानिए पूरी योजना

    उत्तर प्रदेश सरकार का किसानों के लिए बड़ा तोहफ़ा – आलू बीज पर ₹800 प्रति क्विंटल की छूट, राज्य के लाखों किसानों को होगा सीधा लाभ

    उत्तर प्रदेश में आलू किसानों के लिए खुशखबरी: 800 रुपये प्रति क्विंटल की छूट, जानिए पूरी योजना


    किसानों के चेहरे पर मुस्कान, योगी सरकार की ऐतिहासिक पहल 

    उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों के हित में एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए विभागीय आलू बीज पर ₹800 प्रति क्विंटल की विशेष छूट देने की घोषणा की है। यह निर्णय राज्य के लाखों आलू उत्पादक किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। इससे किसानों को गुणवत्तायुक्त बीज कम कीमत पर उपलब्ध होगा और वे उत्पादन लागत को घटाकर अधिक लाभ अर्जित कर सकेंगे। सरकार का यह कदम किसानों की आय दोगुनी करने और कृषि क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मजबूत पहल माना जा रहा है।


    योजना का उद्देश्य: अधिक उत्पादन और आत्मनिर्भरता की ओर कदम

    राज्य सरकार का उद्देश्य इस योजना के माध्यम से किसानों को उन्नत श्रेणी के आलू बीज उपलब्ध कराना है, ताकि प्रदेश में आलू उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि हो सके। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है और यहां लगभग 6.96 लाख हेक्टेयर भूमि पर आलू की खेती होती है। राज्य का योगदान देश के कुल आलू उत्पादन में लगभग 30 से 35 प्रतिशत तक है। इस योजना से किसानों की लागत घटेगी और उन्हें बेहतर बीज मिलने से पैदावार में वृद्धि होगी, जिससे कृषि क्षेत्र की उत्पादकता नई ऊंचाइयों पर पहुंचेगी।


    मंत्री ने दी जानकारी, सभी जिलों में लागू होगी योजना

    उद्यान एवं कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार और निर्यात राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह ने सोमवार को अपने सरकारी आवास पर विभागीय समीक्षा बैठक के दौरान इस योजना की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025-26 के लिए विभागीय आलू बीज की दरों पर ₹800 प्रति क्विंटल की छूट दी जाएगी। मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि यह योजना पारदर्शी ढंग से सभी जिलों में लागू की जाए ताकि हर किसान को इसका लाभ मिल सके।


    नए दरों पर किसानों को मिलेगा विभागीय बीज

    वर्तमान में उद्यान विभाग के आलू बीज की विक्रय दरें उत्पादन लागत के आधार पर ₹2760 से ₹3715 प्रति क्विंटल तक थीं, जबकि निजी कंपनियों के बीज ₹2500 से ₹3500 प्रति क्विंटल तक उपलब्ध थे। अब सरकार द्वारा दी गई ₹800 की छूट के बाद किसानों के लिए विभागीय आलू बीज की दरें घटकर ₹1960 से ₹2915 प्रति क्विंटल के बीच होंगी। इससे किसानों को गुणवत्तायुक्त बीज बाजार दर से सस्ता मिलेगा।
    यह छूट केवल किसानों के लिए है — शोध संस्थाओं एवं अन्य सरकारी संस्थाओं को इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।


    उद्यान विभाग के पास 41,876 क्विंटल बीज का भंडारण

    राज्य के उद्यान विभाग के पास वर्तमान में 41,876 क्विंटल आलू बीज भंडारित है, जिसे किसानों को नकद मूल्य पर उपलब्ध कराया जाएगा। विभाग की योजना है कि इस बीज को किसानों तक शीघ्रता से पहुंचाया जाए, ताकि किसान आगामी फसल सीजन के लिए तैयार हो सकें और स्वयं बीज उत्पादन की दिशा में भी आगे बढ़ें। इससे राज्य में आलू बीज की आत्मनिर्भरता का लक्ष्य साकार होगा।


    किसान कैसे प्राप्त करेंगे छूटयुक्त बीज

    किसान अपने जनपदीय उद्यान अधिकारी से संपर्क कर विभागीय आलू बीज खरीद सकते हैं। बीज वितरण नकद मूल्य पर होगा और यह प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी रहेगी। योजना का विशेष लाभ छोटे और सीमांत किसानों तक प्राथमिकता के साथ पहुंचाने की तैयारी की गई है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे समय रहते विभागीय बीज केंद्रों से बीज प्राप्त कर लें, ताकि वे आगामी बुवाई के लिए तैयार रहें।


    कृषि अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल

    उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में आलू की प्रमुख भूमिका है। आलू न केवल राज्य के किसानों के लिए नकदी फसल है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, रोजगार और ग्रामीण विकास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य में हर वर्ष लगभग 26 लाख मीट्रिक टन आलू बीज की आवश्यकता होती है। गुणवत्तायुक्त बीज की कमी के कारण किसानों को पहले निजी स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता था, पर अब विभागीय बीज सस्ती दरों पर उपलब्ध होने से उनकी यह समस्या दूर होगी। इससे राज्य की कृषि प्रणाली में आत्मनिर्भरता आएगी और किसानों को स्थायी लाभ मिलेगा।


    गुणवत्ता और पारदर्शिता पर विशेष ध्यान

    उद्यान मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि बीज वितरण की प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार या पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विभागीय अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि किसानों तक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप प्रमाणित बीज ही पहुंचे। इससे बीज उत्पादन की गुणवत्ता बनी रहेगी और फसल की उत्पादकता में निरंतर वृद्धि होगी।


    किसानों की आय में होगी वृद्धि

    सरकार का लक्ष्य केवल बीज की आपूर्ति करना नहीं है, बल्कि किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी सुनिश्चित करना है। बीज पर मिलने वाली यह छूट किसानों की लागत घटाएगी, जिससे उनका लाभांश बढ़ेगा। इसके अलावा, किसानों को प्रोत्साहन मिलेगा कि वे स्वयं अपने खेतों में बीज उत्पादन करें और स्थानीय स्तर पर बीज की उपलब्धता को बढ़ावा दें। इससे भविष्य में प्रदेश आलू बीज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा।


    प्रदेश में आलू उत्पादन का भविष्य और सरकार की रणनीति

    उत्तर प्रदेश सरकार ने आलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई तकनीकी और नीतिगत कदम उठाए हैं। इनमें आधुनिक भंडारण सुविधाओं का विस्तार, बीज उत्पादन केंद्रों का सुदृढ़ीकरण और किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करना शामिल है। साथ ही, आलू आधारित प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देने पर भी सरकार जोर दे रही है, जिससे किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिल सके।

    इस योजना के सफल क्रियान्वयन से प्रदेश में आलू उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने की संभावना है। किसानों को जहां उच्च उपज प्राप्त होगी, वहीं उपभोक्ताओं को भी बेहतर गुणवत्ता का आलू सुलभ दरों पर उपलब्ध होगा। इससे राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण समृद्धि दोनों को नई दिशा मिलेगी।


    निष्कर्ष: आत्मनिर्भर किसान, समृद्ध उत्तर प्रदेश

    उत्तर प्रदेश सरकार का यह निर्णय केवल एक राहत पैकेज नहीं, बल्कि किसानों के सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया एक ठोस कदम है। ₹800 प्रति क्विंटल की छूट से जहां किसानों की जेब पर बोझ कम होगा, वहीं गुणवत्तायुक्त बीज के उपयोग से उत्पादन क्षमता बढ़ेगी। यह योजना राज्य के कृषि परिदृश्य में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मील का पत्थर साबित होगी।

  • भारत का फूड सिक्योरिटी मिशन 2025: 81 करोड़ लोगों तक मुफ्त राशन

    भारत का फूड सिक्योरिटी मिशन 2025: 81 करोड़ लोगों तक मुफ्त राशन

    81 करोड़ नागरिकों तक खाद्य और पोषण सुरक्षा पहुँचाने की दिशा में भारत सरकार का ऐतिहासिक अभियान

    भारत का फूड सिक्योरिटी मिशन 2025: 81 करोड़ लोगों तक मुफ्त राशन


    खाद्य और पोषण समानता की दिशा में एक नया युग

    भारत सरकार ने देश की जनता को भूख और कुपोषण से मुक्त करने के लिए एक व्यापक रणनीति अपनाई है। उद्देश्य केवल यह नहीं है कि हर नागरिक के पास पर्याप्त भोजन हो, बल्कि यह भी कि उसे पौष्टिक और सुरक्षित भोजन मिले। इस दिशा में वर्षों से जारी प्रयासों को नई गति देने के लिए केंद्र सरकार ने खाद्य सुरक्षा और पोषण के क्षेत्र में कई अभिनव योजनाएँ लागू की हैं।


    राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन तक

    वर्ष 2007–08 में शुरू हुआ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) भारत के कृषि क्षेत्र में परिवर्तन का आधार बना। इस मिशन ने धान, गेहूं और दालों की उत्पादकता बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और किसानों की आय बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया। बाद में वर्ष 2014–15 में मोटे अनाजों को भी इसमें शामिल किया गया ताकि संतुलित आहार सुनिश्चित किया जा सके।
    वर्ष 2024–25 में इस मिशन को पुनर्गठित करते हुए इसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (NFSNM) का नाम दिया गया। इस नए संस्करण में अब उत्पादन के साथ-साथ पोषण सुधार को भी समान प्राथमिकता दी गई है, ताकि हर नागरिक स्वस्थ और सक्षम जीवन जी सके।


    राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 – भूख के खिलाफ सबसे मजबूत कवच

    राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) भारत सरकार का वह कानून है जो हर नागरिक को भोजन का संवैधानिक अधिकार देता है। इस अधिनियम के तहत ग्रामीण क्षेत्रों की 75% और शहरी क्षेत्रों की 50% जनसंख्या यानी लगभग 81.35 करोड़ लोग सस्ती दरों (वर्तमान में पूर्णतः निशुल्क) पर खाद्यान्न प्राप्त करते हैं।

    अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के परिवारों को प्रति माह 35 किलोग्राम अनाज दिया जाता है, जबकि प्राथमिकता वाले परिवारों (PHH) को प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम अनाज मिलता है।

    केंद्र सरकार ने जनवरी 2023 से दिसंबर 2028 तक सभी लाभार्थियों को निःशुल्क अनाज देने का निर्णय लिया है, जिस पर 11.80 लाख करोड़ रुपये का व्यय अनुमानित है।
    अक्टूबर 2025 तक 78.90 करोड़ नागरिकों को नियमित रूप से निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध हो रहा है, जिससे देश में भूखमरी और कुपोषण में बड़ी कमी आई है।


    लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) – पारदर्शिता और तकनीक का संगम

    NFSA की सफलता काफी हद तक लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) पर निर्भर करती है।
    इसमें केंद्र सरकार खाद्यान्न की खरीद और आवंटन का कार्य करती है, जबकि राज्य सरकारें लाभार्थियों की पहचान, राशन कार्ड वितरण और उचित मूल्य की दुकानों का संचालन करती हैं।
    अब तक 99.9% राशन कार्ड्स आधार से जोड़े जा चुके हैं, और देशभर की 5.41 लाख उचित मूल्य की दुकानों को e-PoS मशीनों से जोड़ा गया है। इससे वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनी है।


    सरकार की प्रमुख पहलें – हर थाली तक पोषण पहुँचाने की दिशा में

    1. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY)

    कोविड महामारी के समय शुरू हुई यह योजना अब NFSA का हिस्सा है। केंद्र सरकार के 100% वित्त पोषण से यह योजना दिसंबर 2028 तक जारी रहेगी। इसका लाभ यह है कि हर पात्र परिवार को बिना किसी आर्थिक बोझ के आवश्यक खाद्यान्न उपलब्ध हो रहा है।

    2. चावल सुदृढ़ीकरण कार्यक्रम (Rice Fortification)

    भारत सरकार ने 2019 में कुपोषण से लड़ने के लिए सुदृढ़ चावल वितरण की पहल शुरू की थी। अब 2024 से सभी सार्वजनिक योजनाओं के तहत वितरित चावल को आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 से पोषित किया जा रहा है। यह कदम बच्चों और महिलाओं में एनीमिया रोकने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है। इस योजना पर ₹17,082 करोड़ की लागत से दिसंबर 2028 तक कार्य जारी रहेगा।

    3. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT)

    2015 में आरंभ यह व्यवस्था लाभार्थियों को नकद राशि सीधे उनके बैंक खातों में प्रदान करती है ताकि वे अपनी पसंद का खाद्य खरीद सकें। यह योजना चंडीगढ़, पुडुचेरी और दमन-दीव एवं दादरा नगर हवेली में लागू है और इससे पारदर्शिता तथा आत्मनिर्भरता दोनों को बढ़ावा मिला है।

    4. एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड (ONORC)

    इस पहल ने प्रवासी मजदूरों और कमजोर वर्गों के लिए जीवन को सरल बनाया है। देश के सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू इस योजना से 81 करोड़ से अधिक लाभार्थी किसी भी स्थान से राशन प्राप्त कर सकते हैं। अब तक 191 करोड़ लेन-देन इस पोर्टेबिलिटी सिस्टम के तहत दर्ज किए गए हैं।


    महिला और बाल पोषण कार्यक्रम – अगली पीढ़ी का सशक्तिकरण

    एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS)

    यह योजना गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और छह वर्ष तक के बच्चों को पूरक पोषण, स्वास्थ्य जांच और परामर्श उपलब्ध कराती है। “टेक होम राशन” और गर्म भोजन के माध्यम से देश के लाखों परिवारों को पोषण सुरक्षा दी जा रही है।

    प्रधानमंत्री पोषण योजना (PM POSHAN)

    पूर्व में मध्याह्न भोजन योजना के रूप में जानी जाने वाली यह योजना विद्यालयों के बच्चों को पौष्टिक गर्म भोजन उपलब्ध कराती है। इससे न केवल बच्चों के पोषण स्तर में सुधार हुआ है बल्कि स्कूलों में उपस्थिति भी बढ़ी है।


    कृषि खरीद, भंडारण और मूल्य स्थिरता के प्रयास

    किसानों को उचित मूल्य देने और खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार लगातार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसल खरीदती है।

    जुलाई 2025 तक केंद्रीय पूल में 377.83 LMT चावल और 358.78 LMT गेहूं सुरक्षित रूप से संग्रहित था।

    खरीफ विपणन सत्र 2024–25 में 813.88 LMT धान की खरीद कर 1.15 करोड़ किसानों को ₹1.9 लाख करोड़ का भुगतान किया गया, जबकि रबी सत्र 2025–26 में 300.35 LMT गेहूं खरीद से 25.13 लाख किसानों को ₹72,834 करोड़ का लाभ मिला।


    डिजिटलीकरण और पारदर्शिता की नई दिशा

    सरकार ने एकीकृत खाद्य प्रबंधन प्रणाली (IFMS) लागू कर पूरे वितरण तंत्र को डिजिटल रूप दिया है। इससे डेटा रियल-टाइम में उपलब्ध होता है और अनियमितताओं पर नियंत्रण पाया गया है।
    इसके अतिरिक्त, Open Market Sale Scheme (OMSS-D) के तहत अधिशेष अनाज बाजार में नियंत्रित दरों पर बेचा जाता है ताकि महंगाई न बढ़े।

    भारत अटा, भारत चावल और भारत दाल जैसी पहलों ने आम उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न उपलब्ध कराया है।


    निष्कर्ष – हर भारतीय की थाली में सम्मान और पोषण

    भारत सरकार का यह बहुआयामी मिशन उत्पादन, वितरण और पोषण – इन तीन स्तंभों पर खड़ा है।

    NFSNM किसानों की उत्पादकता और आय बढ़ाने का माध्यम है, जबकि NFSA और PMGKAY जैसे कार्यक्रम यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी नागरिक की थाली खाली न रहे।

    Rice Fortification, ONORC, DBT और ICDS जैसी योजनाएँ इस प्रयास को और सशक्त बनाती हैं।

    यह मिशन केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकल्प है — ऐसा संकल्प जो भारत को भूख और कुपोषण से मुक्त, आत्मनिर्भर और सशक्त बनाएगा।
    भारत आज उस दिशा में अग्रसर है जहाँ 81 करोड़ नागरिकों को समान खाद्य और पोषण अधिकार प्राप्त हैं — यही है समृद्ध और स्वस्थ भारत का आधार

  • पंजाब में जीएसटी सुधार 2025: कपड़ा, डेयरी और हस्तशिल्प उद्योग को बड़ी राहत

    पंजाब में जीएसटी सुधार 2025: कपड़ा, डेयरी और हस्तशिल्प उद्योग को बड़ी राहत

    जीएसटी सुधारों से पंजाब के उद्योग, रोजगार और आजीविका को नई रफ्तार

    पंजाब में जीएसटी सुधार 2025: कपड़ा, डेयरी और हस्तशिल्प उद्योग को बड़ी राहत


    12% से घटाकर 5% जीएसटी करने से वस्त्र, हस्तशिल्प, फुटवियर, धातु, डेयरी, एग्रो और साइकिल उद्योगों को मिला बड़ा लाभ

    चंडीगढ़, अक्टूबर 2025:
    पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार के सहयोग से राज्य के औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में नई जान फूंकने वाले जीएसटी सुधारों को लागू किया है। इन सुधारों के तहत वस्त्र, हस्तशिल्प, जूता निर्माण, धातु उत्पाद, डेयरी, खाद्य एवं कृषि उत्पादों तथा साइकिल उद्योग पर जीएसटी दर को 12% से घटाकर 5% कर दिया गया है।

    इस कदम से पंजाब के लाखों किसानों, कारीगरों, एमएसएमई इकाइयों और श्रमिकों को राहत मिली है। साथ ही उत्पादों की लागत में कमी आने से वस्तुएं अब अधिक किफायती और प्रतिस्पर्धी बन गई हैं। इस कर सुधार का उद्देश्य मांग को बढ़ावा देना, उत्पादन को प्रोत्साहित करना, रोजगार सृजन को बढ़ाना और पंजाब की अर्थव्यवस्था को और सशक्त बनाना है।


    वस्त्र एवं परिधान उद्योग को नई दिशा

    पंजाब का वस्त्र उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था की नींव माना जाता है। यहां फुलकारी कढ़ाई, ऊनी शॉल, हैंड ब्लॉक प्रिंटेड कपड़े और पारंपरिक परिधान विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।

    जीएसटी में 12% से 5% की कटौती से इन उत्पादों की लागत घटेगी, जिससे ये घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इस सुधार से हजारों बुनकरों, कढ़ाई करने वाले कारीगरों और लघु उद्योग इकाइयों को प्रत्यक्ष लाभ होगा। इससे न केवल बिक्री बढ़ेगी, बल्कि निर्यात में भी वृद्धि की संभावना है।

    फुलकारी कढ़ाई जैसे उत्पादों में ही लगभग 20,000 कारीगर जुड़े हुए हैं, जिन्हें इस कर सुधार से सीधा लाभ मिलेगा। इससे पंजाब के वस्त्र उद्योग को नई गति और पहचान मिलेगी।


    पंजाबी जूती उद्योग को राहत

    पंजाब की पारंपरिक पहचान पंजाबी जूती का निर्माण पटियाला, अमृतसर और फाजिल्का के कारीगरों द्वारा किया जाता है। यह उद्योग लगभग 15,000 लोगों को रोजगार देता है। जूतियां न केवल घरेलू बाजारों में, बल्कि ब्रिटेन, कनाडा और अन्य देशों में भी लोकप्रिय हैं।

    जीएसटी दर में कमी से उत्पादन लागत घटेगी, जिससे जूतियों की कीमत कम होगी और बिक्री में वृद्धि होगी। यह सुधार इस पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करेगा, छोटे पैमाने के उद्यमों को मजबूत बनाएगा और निर्यात क्षमता को बढ़ाएगा। इससे कारीगरों की आय में सुधार होगा और पंजाब की पारंपरिक कारीगरी को विश्व पटल पर और मजबूती मिलेगी।


    हस्तशिल्प और लकड़ी उत्पादों को प्रोत्साहन

    पंजाब के हस्तशिल्प और लकड़ी उद्योग को भी जीएसटी सुधारों से बड़ा प्रोत्साहन मिला है। होशियारपुर और पटियाला में लकड़ी के फर्नीचर, सजावटी वस्तुएं और हस्तनिर्मित उत्पाद बनाए जाते हैं। इन उद्योगों में करीब 8,000 कारीगर कार्यरत हैं।

    जीएसटी को 12% से घटाकर 5% किए जाने से इन उत्पादों की लागत में कमी आएगी और बाजार में इनकी मांग बढ़ेगी। इससे लकड़ी शिल्प उद्योग को घरेलू ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी नई पहचान मिलेगी। यह सुधार पारंपरिक कारीगरी को सुरक्षित रखेगा और एमएसएमई इकाइयों को सशक्त करेगा।


    लकड़ी की लाख खिलौना उद्योग में नई जान

    अमृतसर के छोटे उद्योगों में लकड़ी की लाख के खिलौने बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। इस उद्योग में करीब 3,000 महिला कारीगर कार्यरत हैं।

    जीएसटी दर घटने से इन हस्तनिर्मित खिलौनों की लागत कम होगी और ये उत्पाद घरेलू बाजारों में अधिक लोकप्रिय होंगे। साथ ही, विदेशों में भारतीय पारंपरिक खिलौनों की मांग बढ़ने से इस उद्योग को निर्यात के नए अवसर भी प्राप्त होंगे। यह सुधार न केवल पारंपरिक कारीगरी को जीवित रखेगा बल्कि महिला स्वावलंबन को भी बढ़ावा देगा।


    धातु उद्योग को मजबूती

    पंजाब के जालंधर और लुधियाना शहर धातु उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं। यहां स्टेनलेस स्टील, पीतल और तांबे के बर्तनों का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।

    स्टील किचनवेयर उद्योग, जिसमें लगभग 25,000 श्रमिक कार्यरत हैं, को जीएसटी में राहत से बड़ा लाभ हुआ है। उत्पादन लागत घटने से उत्पाद सस्ते होंगे और घरेलू व ऑनलाइन बिक्री दोनों में वृद्धि होगी।

    जालंधर में पारंपरिक पीतल और तांबे के बर्तन बनाने वाले 5,000 कारीगरों को भी इस सुधार से सीधा लाभ मिलेगा। यह कर कटौती पारंपरिक धातु शिल्प को संरक्षित करने और निर्यात बढ़ाने में मदद करेगी।


    खाद्य और कृषि उत्पादों को बढ़ावा

    पंजाब भारत का एक प्रमुख कृषि और डेयरी उत्पादक राज्य है। यहां दूध, घी, मक्खन, पनीर, दही, व्हाइटनर, चॉकलेट और अन्य खाद्य पदार्थों का उत्पादन व्यापक स्तर पर होता है।

    इन उत्पादों पर जीएसटी दर में कमी से उत्पादन लागत घटेगी और लाभ मार्जिन बढ़ेगा। इससे न केवल छोटे उत्पादकों और सहकारी समितियों को फायदा होगा, बल्कि उपभोक्ताओं को भी सस्ते और गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध होंगे।

    यह सुधार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करेगा, रोजगार बढ़ाएगा और पंजाब के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाएगा।


    नमकीन और स्नैक उद्योग में उछाल

    लुधियाना और जालंधर के नमकीन एवं स्नैक उद्योगों में 30,000 से अधिक लोग, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं, कार्यरत हैं। यह उद्योग घरेलू बाजार के साथ-साथ एयरलाइंस और निर्यात बाजार को भी आपूर्ति करता है।

    जीएसटी को घटाकर 5% करने से खुदरा कीमतों में 6–7% की गिरावट आई है, जिससे बिक्री में वृद्धि हुई है। यह सुधार एमएसएमई इकाइयों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने, रोजगार बढ़ाने और महिलाओं को सशक्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।


    अचार और संरक्षित खाद्य उत्पाद उद्योग को प्रोत्साहन

    गुरदासपुर और होशियारपुर के महिला स्व-सहायता समूहों (SHGs) द्वारा बनाए गए अचार, जैम, और अन्य पारंपरिक खाद्य उत्पादों की अब बाजार में और अधिक मांग है। करीब 10,000 महिला उद्यमी इस उद्योग से जुड़ी हैं।

    जीएसटी दर में कमी से इन उत्पादों की कीमतें घटेंगी, जिससे बिक्री बढ़ेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी विस्तार की संभावना बनेगी। इससे ग्रामीण महिला उद्यमिता और आत्मनिर्भर भारत मिशन को बल मिलेगा।


    साइकिल उद्योग को नई रफ्तार

    लुधियाना का साइकिल उद्योग, जो पंजाब की औद्योगिक पहचान का प्रतीक है, में जीएसटी घटने से नई ऊर्जा आई है।
    करीब 40,000 से अधिक लोग इस उद्योग से जुड़े हैं। 12% से घटकर 5% जीएसटी होने से साइकिलें सस्ती होंगी, जिससे घरेलू मांग बढ़ेगी और निर्यात में भी तेजी आएगी। यह सुधार पूरे उत्पादन और आपूर्ति शृंखला में रोजगार को बढ़ावा देगा और पंजाब की औद्योगिक साख को मजबूत करेगा।


    निष्कर्ष

    पंजाब में लागू हुए ये जीएसटी सुधार केवल कर में कटौती नहीं हैं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था में समावेशी विकास और रोजगार सृजन की नई शुरुआत हैं।

    इन सुधारों से उत्पाद सस्ते हुए हैं, बाजार में मांग बढ़ी है और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि हुई है। साथ ही, लाखों कारीगरों, किसानों और श्रमिकों की आजीविका मजबूत हुई है।

    यह कदम पंजाब की कृषि, उद्योग और पारंपरिक कारीगरी को एक साथ जोड़ते हुए राज्य को “उत्पादन, रोजगार और समृद्धि” के नए युग की ओर अग्रसर कर रहा है।