Fertilizer Subsidy: देश के किसानों के लिए एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आई है। केंद्र सरकार एक बार फिर उर्वरक सब्सिडी को सीधे किसानों के बैंक खाते में भेजने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इस नई व्यवस्था को “ट्रू DBT मॉडल” यानी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर का सच्चा स्वरूप कहा जा रहा है। सरकार का तर्क है कि इस बदलाव से पारदर्शिता बढ़ेगी, खाद की कालाबाजारी रुकेगी और किसान अपनी जरूरत के हिसाब से खाद का चुनाव कर सकेंगे। लेकिन इस प्रस्ताव ने खेती पर सबसे अधिक निर्भर राज्यों खासकर पंजाब में किसानों के बीच भारी बेचैनी और डर पैदा कर दिया है। किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि जो यूरिया की बोरी आज उन्हें महज 265 से 270 रुपये में मिल रही है उसके लिए कल उन्हें पहले 2,400 रुपये की पूरी बाजार कीमत चुकानी पड़ सकती है।
Fertilizer Subsidy: मौजूदा व्यवस्था और नए मॉडल में क्या है फर्क?
अभी जो व्यवस्था चल रही है उसमें सरकार उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी की रकम सीधे देती है और इसी वजह से किसानों को सस्ती दर पर खाद मिल पाती है। 45 किलो की यूरिया की एक बोरी की वास्तविक बाजार लागत करीब 2,400 रुपये बताई जाती है लेकिन सरकारी सब्सिडी के कारण किसान को यही बोरी महज 265 से 270 रुपये में मिल जाती है। यानी सरकार करीब 2,130 रुपये प्रति बोरी की सब्सिडी सीधे कंपनियों को देती है।
अब प्रस्तावित ट्रू DBT मॉडल में यह तरीका बदल जाएगा। नई व्यवस्था में किसान को पहले खाद की पूरी बाजार कीमत यानी 2,400 रुपये अपनी जेब से चुकाने होंगे और उसके बाद सरकार सब्सिडी की राशि उनके बैंक खाते में डालेगी। यानी पहले खर्च करो बाद में पैसा मिलेगा, यही इस मॉडल की बुनियाद है।
Fertilizer Subsidy: पंजाब के किसानों की चिंता क्यों है सबसे गहरी
पंजाब देश के उन राज्यों में शामिल है जहां प्रति हेक्टेयर उर्वरक की खपत सबसे अधिक होती है। यहां धान और गेहूं का फसल चक्र चलता है जिसमें प्रति एकड़ औसतन दो बोरी यूरिया का इस्तेमाल होता है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा व्यवस्था में एक एकड़ खेत पर यूरिया का खर्च करीब 540 रुपये बैठता है। लेकिन अगर DBT मॉडल लागू हुआ तो यही खर्च एक झटके में लगभग 4,800 रुपये हो जाएगा। यानी लगभग नौ गुना का अंतर। यही आंकड़ा किसानों को सबसे अधिक डरा रहा है।
छोटे और सीमांत किसानों की हालत तो और भी कठिन है। बुवाई के समय उनके ऊपर पहले से ही बीज, डीजल, मजदूरी और कीटनाशकों का भारी बोझ होता है। ऐसे में खाद के लिए हजारों रुपये पहले से व्यवस्था करना उनके लिए बेहद मुश्किल होगा। किसान नेताओं की आशंका है कि इससे किसानों की निर्भरता एक बार फिर आढ़तियों और अनौपचारिक कर्ज देने वालों पर बढ़ जाएगी जो किसानों की आर्थिक बदहाली को और गहरा करेगा।
Fertilizer Subsidy: क्या सब्सिडी धीरे-धीरे खत्म होने का खतरा है?
किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों की एक और बड़ी चिंता यह है कि यह बदलाव केवल भुगतान का तरीका बदलने तक सीमित नहीं रहेगा। उन्हें डर है कि आगे चलकर सब्सिडी की राशि में कटौती हो सकती है, उसके भुगतान में लंबी देरी हो सकती है या फिर सब्सिडी पाने के लिए कोई सीमा तय कर दी जा सकती है। इस आशंका के पीछे रसोई गैस सब्सिडी का उदाहरण है। जब एलपीजी में DBT लागू हुआ तो शुरुआत में सब्सिडी मिलती रही लेकिन धीरे-धीरे इसका दायरा सिकुड़ता गया और बाद में यह बंद ही हो गई। किसान संगठन खाद सब्सिडी के साथ भी ऐसा ही होने की आशंका जता रहे हैं।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों और वैश्विक वित्तीय दबावों के चलते कृषि इनपुट सब्सिडी को लंबे समय में कम करने की आशंका भी जताई जा रही है। आलोचकों का कहना है कि DBT मॉडल उसी दिशा में पहला कदम है।
Fertilizer Subsidy: किराएदार किसानों की अलग मुसीबत
पंजाब में एक और बड़ी समस्या है। यहां बड़ी संख्या में किसान किराए की जमीन पर खेती करते हैं लेकिन जमीन के कागजात अक्सर असली मालिक के नाम पर होते हैं न कि खेती करने वाले के नाम पर। किसान नेताओं की चिंता है कि अगर सब्सिडी को भूमि रिकॉर्ड से जोड़ा गया तो सब्सिडी का पैसा असली किसान के खाते में न जाकर जमीन के कागजी मालिक के पास चला जाएगा। इसके अलावा बाढ़ या मिट्टी के कटाव से प्रभावित जमीनों के मामले में पात्रता तय करना और भी जटिल हो जाएगा।
सरकार का मानना है कि DBT मॉडल से किसान सशक्त होंगे और उन्हें खाद चुनने की अधिक आजादी मिलेगी। लेकिन पंजाब के किसान इसे नकद संकट, बढ़ते कर्ज और सब्सिडी के भविष्य पर एक बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं। यह मामला आने वाले समय में कृषि नीति का एक बड़ा विवादास्पद मुद्दा बन सकता है।
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