Karnal Bunt: फरवरी-मार्च का महीना गेहूं की फसल के लिए सबसे संवेदनशील समय होता है। इस दौरान फसल फूलने और दाना भरने की अवस्था में होती है। ठीक इसी समय गेहूं पर कई तरह की बीमारियां और खरपतवार हमला बोलते हैं जो पैदावार को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं। इनमें सबसे खतरनाक करनाल बंट रोग है जिसे कृषि विशेषज्ञ गेहूं का कैंसर कहते हैं। इसके अलावा लूज स्मट यानी अनावृत कंडवा भी गेहूं की फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है। किसान भाइयों को इन बीमारियों की पहचान और बचाव के तरीके जरूर जानने चाहिए।
Karnal Bunt: पहले समझें खरपतवारों की समस्या
गेहूं की फसल में खरपतवार भी एक बड़ी समस्या है। गोयला, चील, प्याजी, मोरवा, गुल्ली डंडा, बथुआ, अकरी, वनबट्टी, कृष्णनील और जंगली जई जैसे खरपतवार फसल के साथ-साथ उग आते हैं। ये खरपतवार मिट्टी के पोषक तत्व, नमी और स्थान के लिए गेहूं के पौधों से सीधी प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे फसल की वृद्धि रुक जाती है और उत्पादन में भारी गिरावट आती है। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर खरपतवार नियंत्रण न करने पर गेहूं की पैदावार में 20 से 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
खरपतवारों के नियंत्रण के लिए किसान पेंडीमिथेलीन, सल्फोसल्फूरान, मेट्रीब्यूजिन, 2-4 डी, आइसोप्रोफ्यूरान, क्लोडीनोफॉप, मेटासल्फूरान, मिसोसल्फूरान और आइडोसल्फूरान जैसे खरपतवारनाशी दवाओं का छिड़काव कर सकते हैं। ध्यान रखें कि इन दवाओं का प्रयोग सही समय पर और निर्धारित मात्रा में ही करें।
Karnal Bunt: क्या है करनाल बंट रोग?
करनाल बंट गेहूं का सबसे खतरनाक और डरावना रोग है। इसे Tilletia indica नामक फफूंद पैदा करती है। यह रोग इतना गंभीर है कि इसे क्वारंटाइन के लिए प्रतिबंधित रोगों की सूची में रखा गया है। यानी इस रोग से प्रभावित क्षेत्रों का अनाज अंतरराष्ट्रीय व्यापार में प्रतिबंधित हो जाता है। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान तो होता ही है साथ ही देश के निर्यात पर भी असर पड़ता है। यह रोग बीज, मिट्टी और हवा तीनों माध्यमों से तेजी से फैलता है जिससे यह और भी खतरनाक हो जाता है।
Karnal Bunt: करनाल बंट के लक्षण कैसे पहचानें?
करनाल बंट के लक्षण सामान्यतः फूलों वाली अवस्था में दिखाई देने लगते हैं। प्रभावित पौधों के दानों के चारों ओर काला पाउडर दिखाई देता है। इस रोग की सबसे अनोखी पहचान यह है कि प्रभावित दानों से एक अजीब और तीखी दुर्गंध आती है। यह दुर्गंध ट्राइमिथाइलेमाइन नामक रासायनिक यौगिक के कारण उत्पन्न होती है। अगर खेत में इस तरह के लक्षण दिखें तो तुरंत कृषि विशेषज्ञ से संपर्क करें।
Karnal Bunt: करनाल बंट से बचाव के उपाय
करनाल बंट से फसल की रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय अपनाने चाहिए। सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम है करनाल बंट प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना। बाजार में कई ऐसी उन्नत किस्में उपलब्ध हैं जिनमें इस रोग से लड़ने की क्षमता होती है। बुवाई से पहले बीज उपचार करना भी अनिवार्य है क्योंकि यह रोग बीज के जरिए भी फैलता है। फूलों वाली अवस्था में खेत में सिंचाई बिल्कुल नहीं करनी चाहिए क्योंकि नमी इस रोग के फफूंद को फैलने में मदद करती है।
रासायनिक नियंत्रण के लिए बाविस्टिन 1000 ग्राम प्रति हेक्टेयर और प्रोकोनोजोल 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें। बीज उपचार के लिए एग्रोसान जीएन यानी पीएमए का 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से प्रयोग करें। सही समय पर बीज उपचार करने से इस रोग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
Karnal Bunt: लूज स्मट यानी अनावृत कंडवा रोग
लूज स्मट या अनावृत कंडवा भी गेहूं का एक गंभीर फफूंद जनित रोग है। इस रोग में गेहूं के खेतों में सामान्य बालियों से पहले निकलने वाली बालियों पर काला पाउडर बन जाता है। इस रोग की खास बात यह है कि इसके लक्षण तने और पत्तियों पर नहीं दिखाई देते। बालियों के स्थान पर प्रभावित बालियों के दानों में काला पाउडर भर जाता है जिन्हें स्पुर कहा जाता है। ये स्पुर हवा से उड़कर दूसरे स्वस्थ पौधों को भी संक्रमित कर देते हैं।
Karnal Bunt: लूज स्मट का नियंत्रण कैसे करें?
लूज स्मट के नियंत्रण के लिए सबसे पहले रोग से प्रभावित पौधों को खेत से बाहर निकालकर जमीन में गाड़ दें ताकि यह रोग आगे न फैले। बीजों को संक्रमण मुक्त बनाने के लिए सोलर उपचार विधि अपनाई जा सकती है। इसके अलावा गर्म जल उपचार विधि भी बेहद कारगर है जिसमें बीजों को 54 डिग्री सेल्सियस तापमान के गर्म पानी में 30 मिनट तक डुबोकर रखा जाता है। रासायनिक नियंत्रण के लिए बीज बुवाई से पहले वीटा वेक्स फफूंदनाशक दवा 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार करें। यह उपचार बेहद सस्ता और प्रभावी है।
किसान भाइयों को सलाह दी जाती है कि फसल की नियमित निगरानी करें और किसी भी असामान्य लक्षण दिखने पर तुरंत नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग के अधिकारी से संपर्क करें। समय पर पहचान और सही उपाय से इन बीमारियों से फसल को बचाया जा सकता है और अच्छी पैदावार हासिल की जा सकती है।
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